Category Archive : राजनीति

5 राज्यों का खेला, किसने किसको पेला, ये बिगाड़ देंगे भाजपा-कांग्रेस दोनों का ही खेल…

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अगले दो-तीन महीनों में पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें से हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। इस बीच आ रहे अलग-अलग सर्वे में कहीं भारतीय जनता पार्टी, कहीं कांग्रेस तो कहीं किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।  इनमें से दो छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा की शिवराज सिंह चौहान की सरकार है। ये चुनाव 2024 लोकसभा का सेमीफाइनल की तरह होगा और इनके नतीजे 24 के लोकसभा पर बड़ा असर डालेंगे,, इन तीनों ही राज्यों में भाजपा और कांग्रेस  दोनों दल बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन तीनों राज्यों में 9 ऐसे छोटे दल हैं जो दोनों ही बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने को आतुर हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि अगर दोनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने छोटे दलों को नहीं साधा तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।2024 लोकसभा  से पहले जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, मोदी सरकार के लिए ये सबसे अहम चुनाव साबित होंगें,तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा को इन चुनावों में जीत बेहद जरूरी है,इनमे सबसे अधिक सीट वाले मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावी नतीजे कई हद तक 2024 की दिशा तय करेंगे,इन राज्यों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी एक बड़े मनोबल से 24 के रण में उतरेगी,भाजपा अगर यहां जीत दर्ज करने में कामयाब होती है तो पुरे देश में उनका माहौल बनेगा,और अगर कांग्रेस इसमें कामयाब हुई तो न केवल गटबंधन में कांग्रेस का पक्ष सबसे मजबूत होगा बल्कि पुरे देश में कांग्रेस एक नए उत्त्साह से चुनाव लड़ेगी और ये विपक्षी खेमें में भी जोश भरेगी,, लेकिन मध्य प्रदेश,राजस्थान,छतीशगढ में कुछ छोटे ऐसे दल भी हैं जो इन दोनों पार्टियों में किसी की भी पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं,इन राज्यों का समीकरण हम आपको सिलसिलेवार तरिके बताते हैं।

123 सीटों पर होने वाला है खेल-

पहले बात मध्य प्रदेश की जहां लोकसभा की 29 सीट हैं,,जहां से 2019 में मोदी सरकार 28 सीट जितने में कामयाब रही थी,लेकिन विधानसभा में कांग्रेस ने उसको नजदीकी मुकाबले में हरा दिया और राज्य की सत्ता पाने में कामयाबी हासिल की,हलाकि कुछ समय बाद ज्योतिराज सिंधिया कुछ विधयकों को लेकर भाजपा में शामिल हो गए और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अल्पमत के कारण गिर गयी,और शिवराज फिर मुख़्यमंत्री बन गए,लेकिन इस बार कांग्रेस मध्य प्रदेश में भाजपा को फिर कड़ी चुनौती देती दिखाई दे रही है और एक बार फिर भाजपा कांग्रेस में यहां कांटे का मुकाबला देखने को मिल सकता है,लेकिन इस बार छोटे दल और निर्दलीय यहां किसी भी पार्टी का समीकरण बिगाड़ने को तैयार है,ये भी सम्भव है कि चुनाव नतीजों के बाद ये किंग मेकर की भूमिका निभा सकते हैं, मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं। इनमें से 47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाते के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा 41 और सामान्य सीटें हैं, जहां SC/ST वोटर हार-जीत तय करते हैं। यानी कुल 123 सीटों पर तगड़ा खेल होने वाला है क्योंकि इन सीटों पर तीन छोटे दलों की मौजूदगी और अच्छी पकड़  मानी जाती है। उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बुंदेलखंड क्षेत्र में मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी एक प्रमुख सियासी खिलाड़ी है। ग्वालियर चंबल क्षेत्र में दलित (SC) मतदाताओं पर बसपा का अच्छा प्रभाव माना जाता है।

इसी तरह महाकोशल क्षेत्र की कई सीटों पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) की मजबूत पकड़ मानी जाती है। पांच साल पहले यानी 2018 के चुनावों में जीजीपी ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बनाकर कुल 125 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उस गठबंधन को सिर्फ एक सीट ही मिली थी। इन दोनों के अलावा हीरालाल अलावा के नेतृत्व  वाले जय आदिवासी युवा शक्ति (JAYS) इस साल मई में मध्य प्रदेश में एसटी के लिए आरक्षित 47 सीटों सहित कुल 80 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। पिछली बार उन्होंने कांग्रेस के साथ समझौता किया था और उसी की टिकट पर हीरालाल विधायक चुने गए थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन छोटे दलों की खींचतान की वजह से भाजपा या कांग्रेस किसी को भीनुकसान  हो सकता है।  इन छोटे दलों का वोट प्रतिशत लोकसभा चुनाव में  देखें तो एक बड़ा अंतर् दिखाई देता है लेकिन वही मत प्रतिशत विधानसभा चुनावों के नतीजों पर  बड़ा असर डालता दिखाई देता है और किसी भी सीट पर जितने वाले प्रत्याशी का समीकरण खराब कर सकता है।

 

छत्तीसगढ़ में दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की तुलना-

बात छत्तीसगढ़ की करें तो यहां भी कई दल दोनों राष्टीय दलों का गेम बिगाड़ने के लिए तैयार हैं,, छत्तीसगढ़ में भी मुख्य लड़ाई आदिवासी वोट बैंक और सीटों की है। राज्य की 90 सीटों में से 29 सीटें एसटी कैटगरी के लिए आरक्षित हैं, जबकि अन्य 20 सीटें पर आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) ने 2018 का विधानसभा चुनाव बसपा के साथ गठबंधन में लड़ा था और कुल 11% वोट परसेंट के साथ सात सीटें जीतीं थी। इस बीच, अनुभवी आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम द्वारा स्थापित पार्टी (हमर राज) तेजी से अपने विस्तार कर रहा है। नेताम बस्तर क्षेत्र से आते हैं। वह बसपा और सीपीआई (एम) के साथ गठबंधन कर 50 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं। बसपा का राज्य भर में दलित वोटों के एक वर्ग पर खासा प्रभाव माना  जाता है। ये भी यहां भाजपा और कांग्रेस किसी भी पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं ।

लेकिन इस बार राष्ट्रिय पार्टी का दर्जा मिलने के बाद केजरीवाल की पार्टी आप भी यहां अपना दम दिखाने जा रही है, जो कांग्रेस और बीजेपी का समीकरण बिगाड़ सकती है ,छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 9 गारंटी दी। उन्होंने इस दौरान दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था से छत्तीसगढ़ की शिक्षा की तुलना की। आप नेता व दिल्ली के सीएम ने अपने सहयोगी कांग्रेस पार्टी की सरकार को निशाने पर लिया।अरविंद केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान ने शुक्रवार का छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाने की अपील की।दरअसल, कांग्रेस की छत्तीसगढ़ सरकार पर केजरीवाल ने ऐसे वक्त में ये टिप्पणी की हैस जब दोनों पार्टियों के बीच अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा इसको लेकर बहस छिड़ी हैं। केजरीवाल के यहां चुनाव लड़ने का असर कांग्रेस पर ज्यादा पड़ने के आसार लग रहे हैं,अगर आप यहां थोड़े वोट काटने में कामयाब हुई तो किसी भी पार्टी का समीकरण बिगड़ सकता है।

 

छोटे दलों को मिल सकता है फायदा-

राजस्थान में भी तीन छोटे दल सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं। इनमें राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) की स्थापना पूर्व भाजपा नेता और नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने की है। वह तीन कृषि कानूनों का विरोध करते हुए एनडीए से बाहर हो गए थे। उनका जाटों के बीच प्रभाव है। इसके अलावा, जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली आरएलडी भी एक सियासी खिलाड़ी है जिसने पिछली बार एक विधानसभा सीट जीती थी। आरएलडी का यूपी से सटी सीमा खासकर भरतपुर, धौलपुर और अलवर के इलाकों में जाट वोटरों पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। इनके अलावा मायावती की बसपा भी राजस्थान में दोनों बड़े दलों के लिए सियासी शत्रु है। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने कुल चार फीसदी वोट बैंक पर कब्जा जमाते हुए छह सीटें जीती थीं। हालांकि बाद में बसपा के विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे।ये छोटे दल हलाकि ज्यादा सीट तो नहीं जीत पाती है लेकिन ये कई सीट पर इतना प्रभाव रखती है कि इनको मिलने वाला वोट प्रतिशत किसी भी दल के प्रत्याशी की जीत को हार में बदल सकता है,,,जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस में यहां अंदरूनी जंग छिड़ी है उसका थोड़ा फायदा भी छोटे दलों को मिल सकता है।

 

2024 की राह कितनी आसान-

राजस्थान में जातिगत समीकरणों का भी बड़ा असर रहता है,चुनाव नजदीक आने के साथ जातीय गणित को लेकर भी पार्टियां मंथन में जुटी है। लेकिन राजस्थान की बात करें तो यहां वर्षों से जातिगत समीकरण कई पार्टियों के लिए चौंकाने वाले रहे हैं। पूर्वी बेल्ट राजस्थान का महत्वपूर्ण क्षेत्र है जो मीणा और गुर्जर वोटों के प्रभुत्व के लिए जाना जाता है, जबकि शेखावाटी और मारवाड़ बेल्ट महत्वपूर्ण जाट वोटों के लिए जाना जाता है। मीणाओं ने 2018 में अपने समुदाय के सबसे बड़े नेता किरोड़ी लाल मीणा को खारिज कर सबको चौंका दिया था। जाटों में हनुमान बेनीवाल ने रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की, क्योंकि उन्होंने खुद को जाट नेता के रूप में प्रचारित किया। ऐसे उदाहरणों से समझा जा सकता है कि राजस्थान में पार्टियों के लिए जातीय समीकरणों का अनुमान लगाना कितना कठिन है।

इन राज्यों में सत्ता किसके पास जाएगी यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है लेकिन अलग-अलग सर्वे में कहीं भारतीय जनता पार्टी, कहीं कांग्रेस तो कहीं किसी भी दल को भी स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।ऐसे में ये छोटे दल किंग मेकर की भूमिका में आ सकते हैं,जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई है, उनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना शामिल हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, मिजोरम और तेलंगाना में एक चरण में चुनाव होंगे, जबकि छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव होंगे. सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए 11 दिसंबर को मतगणना होगी और इसी दिन नतीजे आएंगे ,इसी दिन साफ़ हो जायेगा कि 2024 की राह किसकी आसान होगी और किसकी मुश्किलों में इजाफा होगा।

INDIA गठबंधन में जाने को तैयार मोदी के सहयोगी दल…

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2024 के लिए राजनीतिक मैदान सज रहा है NDA VS INDIA में कौन बाजी मारेगा,अभी ये कहना मुश्किल है,लेकिन जिस तरह सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने 38 दल अपने साथ जोड़े है उसको देख भले वो आज खुश दिखाई दें लेकिन अंदर ही अंदर एक सबसे बड़ी चिंता उनको 24 तक साथ रखने की भी है,इतने दलों को साथ लाने का मतलब ये तो साफ़ है कि भाजपा 2024 में एकतरफा मुकाबला मानकर तो नहीं चल रही है,, क्योकि जिस तरह इंडिया गठबंधन खेमे में महाजुटान हुआ है उससे कहीं न कहीं मोदी सरकार चिंतित प्रतीत होती है,और यही कारण है कि भाजपा लगातार अपने साथी कुनबे को बढ़ाने में लगी है,लेकिन इतने दलों को साथ रख पाने के लिए भाजपा को कई समझौते भी करने पड़ेंगे,मगर,,, क्या प्रचंड बहुमत की मोदी सरकार ऐसा कर पायेगी ? आज के वीडियो में बात भाजपा की आने वाले दिनों की उस सबसे बड़ी चिंता की और उन दलों की जो मोदी के साथ हैं,, साथ ही विपक्षी खेमें में कांग्रेस की परेशानी और विपक्षी एकता की बात भी… विस्तार से समझने के लिए इस वीडियो को अंत तक देखिए…अगर सर चक्कराना जाए तो कहना.

PM के नेतृत्व में 38 दल- 

एनडीए आज अपनी बढ़ी हुई ताकत दिखा रहा है. गौर कीजिए जहां अटल बिहारी वाजपेयी के समय एनडीए में 24 दल हुआ करते थे, वहीं आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए में 38 दल शामिल हुए हैं. आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी के लिए इन सहयोगी दलों में सीटों का बंटवारा करना इतना आसान भी नहीं होगा. खासतौर से बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में.. जहां पर यूपी को छोड़ दें तो सीटों की संख्या अधिक है.

 
 
सबसे पहले बात बिहार की- 

 

सबसे पहले बात बिहार की जहां से विपक्षी गठबंधन इंडिया की शुरुआत हुई,,, 2019 में बीजेपी ने जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. समझौते के तहत बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 और लोक जनशक्ति पार्टी ने 6 सीटों पर चुनाव लड़ा. लोक जनशक्ति पार्टी को एक राज्य सभा सीट भी एनडीए की तरफ से दी गई थी, जिससे रामविलास पासवान संसद में पहुंचे थे. तब एनडीए ने राज्य की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की थी. इनमें बीजेपी ने 17, जेडीयू ने 16 और एलजेपी ने 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसा माना जाता है कि बाद में जेडीयू के दबाव में लोक जनशक्ति पार्टी में विभाजन हुआ और चिराग पासवान अलग कर दिए गए. अब बीजेपी चाहती है कि पशुपति पारस और चिराग पासवान अपनी विभाजित पार्टियों का विलय कर दें, लेकिन पशुपति इसके लिए तैयार नहीं. उधर चिराग चाहते हैं कि 2019 के फार्मूले के तहत उनकी पार्टी को छह लोक सभा सीटें और एक राज्य सभा सीट दी जाए. इस विवाद को सुलझाना बीजेपी के लिए यकीनन बड़ी चुनौती होगी. उधर, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी चाहेंगे कि उनकी पार्टियों को अधिक संख्या में लोकसभा सीटें दी जाएं, जबकि बीजेपी चाहेगी कि इस बार वह पिछली बार से अधिक संख्या पर सीटों पर चुनाव लड़े क्योंकि जेडीयू उसके साथ अब नहीं है.

 
 
 
BJP के ये बड़ी चुनौती- 
 

अब बात दूसरे राज्य महाराष्ट्र की,,जहां यूपी के बाद सबसे अधिक लोकसभा सीट है पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी, शिवसेना गठबंधन था. राज्य की 48 में से 25 पर बीजेपी ने और 23 पर शिवसेना ने चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. अब शिवसेना के बीच विभाजन होने के बाद भाजपा के गुट में आए. एकनाथ शिंदे का गुट उन सभी 18 सीटों पर दावेदारी कर रहा है, जो 2019 में शिवसेना ने लड़ी थीं. इस बीच, एनसीपी में भी विभाजन हुआ. और अजीत पवार का गुट बीजेपी के साथ है. लिहाजा अजित पवार भी उम्मीद पाले हुए हैं की वो एनसीपी कोटे की सभी सीटों पर चुनाव लड़े…याद रहे की 2019 में एनसीपी ने चार सीटें जीती थीं. बीजेपी के सामने इन 48 सीटों के बंटवारे की भी चुनौती रहेगी.

 
अब बात यूपी की-
 

वो राज्य जिसने मोदी को देश की सत्ता सौंपने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अब बात उस राज्य यूपी की करना बेहद जरुरी है क्योकि सत्ता की चाभी यूपी से ही होकर निकलती है… 2019 में बीजेपी ने अपना दल के साथ मिल कर लोक सभा चुनाव लड़ा था. तब अपना दल को दो सीटें दी गई थीं जो उसने जीत ली थी. इस बार ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी भी बीजेपी के साथ है. बीजेपी को सीट बंटवारे में भी उन्हें भी साथ रखना होगा. गाजीपुर लोक सभा सीट पर उपचुनाव में राजभर के बेटे खड़े हो सकते हैं. इसके अलावा जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल से भी बीजेपी की बातचीत चल रही है. ऐसा राजनीतिक जानकारों का मानना भी है… भाजपा चाहती है कि आरएलडी का बीजेपी में विलय हो जाए जिसके लिए जयंत तैयार नहीं. अगर भविष्य में आरएलडी साथ आए तो बीजेपी को उसे भी सीटें देनी होगी…यानी बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का सीटों को लेकर बंटवारा मुश्किल तो पैदा जरुर करेगा.

 
 
यहाँ से चुनाव लड़ सकते हैं पीएम मोदी-

 

 

तमिलनाडु में  बीजेपी और AIADMK के बीच 2024 चुनाव मिलकर लड़ने पर सहमति है. कुछ अन्य सहयोगी दल भी साथ लड़ेंगे. 2019 में भी इन दलों ने मिल कर चुनाव लड़ा था. राज्य की 39 लोकसभा सीटों में  AIADMK ने 20, PMK  ने 7, बीजेपी ने 5, DMDK ने 4, पीटी ने 1, तामिल मनीला कांग्रेस एक और PNK ने 1 सीट पर चुनाव लड़ा था.. इस बार कुछ नई पार्टियां भी साथ आईं हैं और बीजेपी तमिलनाडु पर खासतौर से ध्यान दे रही है. पीएम मोदी के भी यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है.. इसका इशारा कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में भी दिखाई देता है,, जहां वो साउथ को दिल्ली के करीब और दिल्ली के दिल में बसे होने की बात करते हुए भी दिखाई देते हैं.. ऐसे में सीटों के बंटवारे पर सबकी नजरें रहेंगी.

 
हरियाणा में भी यही हाल-
 

हरियाणा में बीजेपी और दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी राज्य में मिल कर सरकार चला रहे हैं, लेकिन बीजेपी साफ कर चुकी है कि वह सभी दस लोक सभा सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी और जेजीपी के साथ समझौता नहीं होगा. अटकल यह भी है कि लोक सभा चुनाव से पहले बीजेपी और जेजीपी का गठबंधन टूट जाए और दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ें.

दोनों पार्टियों की  चुनाव लड़ने की संभावना-

झारखण्ड में भी बीजेपी ने 2019 में पहली बार आजसू के साथ लोक सभा चुनाव गठबंधन में लड़ा था. राज्य की 14 में से 11 सीटें बीजेपी और एक सीट आजसू ने जीती थी. इस बार भी दोनों पार्टियों के मिल कर चुनाव लड़ने की संभावना है. 2019 में असम में  बीजेपी ने एजीपी और बीपीएफ के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने राज्य की 14 में से 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि एजीपी को 3 और बीपीएफ को एक सीट दी गई थी. तब बीजेपी ने 10 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि एजीपी और बीपीएफ कोई सीट नहीं जीत सके थे. बदली परिस्थितियों में बीजेपी अधिक सीटों पर लड़ना चाहेगी. अन्य राज्यों जैसे केरल और पूर्वोत्तर में सहयोगी दलों की जमीनी ताकत इतनी अधिक नहीं कि वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मोल-भाव कर सकें. इसलिए बीजेपी को वहां अपनी शर्तों के हिसाब से चुनाव लड़ने में कोई भी परेशानी नहीं आएगी.
भाजपा को इन राज्यों में लग सकता है झटका-

कुल मिलाकर बीजेपी 38 दलों को साथ लेकर तो चल रही है,लेकिन इन सब के साथ टिकट बंटवारा कितना आसान होगा ये आने वाला समय बताएगा, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर टिकट बंटवारे में सहयोगी दलों को भाजपा संतुष्ट नहीं कर पाई तो कई दल ऍन चुनाव के वक्त पर भाजपा का साथ छोड़ कर इंडिया गठबंधन या अकेले चुनाव मैदान में उतर सकते हैं.. जिससे भाजपा की कई राज्यों में न केवल मुश्किलें बढ़ेंगी बल्कि 2024 की जीत का सपना देख रही भाजपा को इन राज्यों में झटका भी लग सकता है,,
क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी? 

ऐसा नहीं है कि ऐसी परेशानी विपक्षी दलों की एकता में नहीं हो सकती है,, आज की कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि ज्यादा मोल भाव कर सकती है. हालांकि कर्नाटक और हिमाचल जीत से कांग्रेस का दावा गठबंधन में मजबूत जरूर हुआ है. लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस की सीटों को लेकर सहयोगी दलों के साथ कॉम्प्रोमाईज़ करना पड़ेगा,जैसे बंगाल,बिहार,महाराष्ट्र,और यूपी. ऐसे में परेशानी विपक्षी खेमे में भी आ सकती है. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को TMC प्रमुख और ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा सीट देनी पड़ेगी, साथ ही लेफ्ट भी गठबंधन का साथी है तो उनकी बात भी रखनी पड़ेगी,यहां कांग्रेस की स्थिति ये नहीं है कि वो इनसे मोल भाव कर सके खासतौर पर ममता से,, एक सवाल और भी खड़ा होता है,,, क्या ममता लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ पाएंगी ? ऐसी ही स्थिति बिहार में भी देखने को मिल सकती है,जहां एक तरफ नीतीश कुमार होंगे और दूसरी तरफ तेजस्वी यादव,,यहां भी कांग्रेस को समझौता करना पड़ेगा,, दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी सत्ता में होने के कारण सबसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी,, ऐसा ही कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में भी परेशानी सामने आएगी,जहां उद्धव  और शरद पवार जैसे नेता गठबंधन के साथी हैं, ऐसे में कांग्रेस कितनी जगह कितना समझौता करेगी INDIA गठबंधन की एकता इस पर काफी हद तक निर्भर करेगी.


ऐसे हालात कई राज्यों में-
कुल मिलाकर कमोबेश ऐसे हालात कई राज्यों में भाजपा और कांग्रेस जैसे मुख्य दलों के सामने आने वाले हैं. बहरहाल पक्ष और विपक्ष की एकता मुख्य रूप से टिकट बंटवारे पर निर्भर करेगी, और यहीं से 2024 की दिशा भी तय होगी, जो भी इस फॉर्मूले को सही ढंग से साध लेगा उसको 2024 में निश्चित रूप से फायदा मिलेगा? यानी सत्ता पर काबिज होने का मौका मिलेगा.

मोदी सरकार की घोटालों की लिस्ट बाहर, गोदी मीडिया में पसरा सन्नाटा…

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देश की मुख्यधारा की मीडिया ने मोदी सरकार के इन 10 सालों में जो भूमिका निभाई, वो कहीं न कहीं बदली हुई नजर आती  है, जिस तरह से मीडिया ने UPA के दौर में गलत फैसलों और घोटालों को लेकर मनमोहन सरकार  की खूब आलोचना की थी , फिर चाहे वो अखबारों के पन्ने से रंगे घोटालों की आवाज़ हों या फिर टीवी डिबेटों से कटघरे में खड़ा करते पत्रकार हों. मनमोहन सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एक भी मौका मीडिया ने चूका नहीं, लेकिन अब मोदी सरकार में इसी मेन स्ट्रीम  मीडिया ने अपना पुराना रुख बदल दिया है, अब मोदी सरकार के गलत कार्यों की आलोचना करने के बजाय ये मीडिया समूह कई बार सरकार का बचाव करते दिखाई देते हैं, यही कारण है कि मोदी सरकार में मीडिया की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं और कई लोग अब इसी मीडिया को गोदी मीडिया भी कहते हैं। उस मीडिया को .जिसको कभी खोजी मीडिया का नाम देश की जनता जनार्दन दिया करती थी।

जब मनमोहन सिंह की सरकार थी-


UPA  की सरकार के दौरान  आयी C. A.G यानी कैग की रिपोर्ट के आधार पर उस समय की मनमोहन सरकार पर कई बड़े-बड़े घोटालों के आरोप लगे,कोयला घोटाला, 2G घोटाला और साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला जैसे बड़े घोटाले सामने आने के बाद मनमोहन सरकार की पुरे देश में में खूब आलोचना हुई, उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने  सरकार को हर जगह घेरना शुरू कर दिया था,कैग की रिपोर्ट का ही असर था कि ये घोटाले सामने आये और इसका एक बड़ा असर देश में ये पड़ा कि 2014 में UPA सरकार की विदाई हो गयी और प्रचंड बहुमत से भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आ गई। 


क्या है 
CAG रिपोर्ट-

वक्त बदला ,हालात बदले और एक बार फिर  कैग की रिपोर्ट  सामने आई है. मगर अब UPA नहीं बल्कि NDA की मोदी सरकार का युग है. और मोदी सरकार के घिरने पर भी हर तरफ निल बटा सन्नाटा है. कैग की रिपोर्ट में दो बड़ी गड़बड़ियां सामने आयी हैं,, दिल्ली में बनाए जा रहे द्वारका एक्सप्रेसवे पर CAG की रिपोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए हैं. CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सड़क की लागत कई गुना ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक, जो लागत प्रति किलोमीटर 18 करोड़ रुपये होनी थी, वहीं पर 250 करोड़ रुपये तक खर्च हुए हैं. सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि कैबिनेट ने इस सड़क के लिए प्रति किलोमीटर का बजट 18.20 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया था लेकिन इसके लिए प्रति किलोमीटर 251 करोड़ रुपये का बजट पास किया गया. अब इस लागत में इतना ज्यादा अंतर आने पर सवाल खड़े हो रहे है। 

 

दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े-

भारतमाला परियोजना-1 के तहत बनाया जा रहा यह द्वारका-एक्सप्रेसवे दिल्ली और गुरुग्राम में आता है. दिल्ली को गुरुग्राम से जोड़ने वाली ये सड़क 29 किलोमीटर लंबी है. यह सड़क दिल्ली के महिपालपुर में शिव मूर्ति के पास से शुरू होती है और गुरुग्राम में खेरकी टोल प्लाजा तक जाती है . यह एक्सप्रेसवे 14 लेन का बनाया जा रहा है. अब इसकी लागत को लेकर हंगामा खड़ा हो गया है और विपक्षी नेताओं ने भी इस पर सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। 

CAG ने द्वारका एक्सप्रेसवे के इस प्रोजेक्ट की 2017 से 2021 तक की रिपोर्ट का ऑडिट किया है. द्वारका एक्सप्रेसवे  के साथ-साथ दिल्ली-वडोदरा एक्सप्रेसवे पर भी सवाल खड़े हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा प्रोजेक्ट CCEA की ओर से अप्रूव्ड प्रोजेक्ट की लिस्ट में ही.. नहीं था  और  और उस  पर भी NHAI ने अपने स्तर पर 33 हजार करोड़ रुपये खर्च कर लिए. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतमाला परियोजना-1 के तहत लगभग 76,999 किलोमीटर की सड़कें बनाई जा रही है. इसमें से 70,950 किलोमीटर सड़क NHAI बना रहा है. NHAI के कई फैसलों पर अब सवाल उठ रहे हैं. ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, NHAI ने CCEA की ओर से तय की गई नियमावली का भी सही से पालन नहीं किया. 50 में से 35 प्रोजेक्ट ऐसे हैं जहां टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है।

CAG रिपोर्ट में एक और बड़ा खुलासा-


कैग की रिपोर्ट में एक और बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है,आयुष्मान भारत योजना  को लेकर..
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें बताया गया है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत 6.9 करोड़ रूपये उन लोगों के इलाज पर खर्च किये गए जो इस दुनिया में ही नहीं हैं,मतलब पहले ही मर चुके लोगों के नाम पर ये खर्च किया गया, आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना  को साल 2018 में शुरू किया गया था. इसका मकसद गरीबों को मुफ्त इलाज देना था, जिसे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शुरू किया गया. इस रिपोर्ट के मुताबिक कुल 3,446 ऐसे मरीजों के इलाज पर कुल 6.97 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जो पहले ही मर चुके थे. डेटाबेस में इन सभी मरीजों को मृत दिखाया गया है. ये पहला मौका नहीं है जब आयुष्मान भारत योजना को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आई हो, इससे पहले भी सीएजी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि करीब 7.5 लाख से ज्यादा लोगों को एक ही मोबाइल नंबर पर रजिस्टर कर दिया गया और जिस पर रजिस्ट्रेशन हुआ वो नंबर भी अमान्य था। 

 
 
क्या कहती है इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट- 


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केरल में ऐसे मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा थी. यहां कुल 966 ऐसे मरीज पाए गए, जिन्हें मृत घोषित करने के बावजूद उनका इलाज जारी था. इनके इलाज पर  करोडों रुपये का भुगतान अस्पतालों को किया गया. इसके बाद मध्य प्रदेश में 403 और छत्तीसगढ़ में 365 ऐसे मरीज मिले. जिनके इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए. फिलहाल योजना के तहत जो गाइडलाइन बनाई गई हैं, उनके मुताबिक अगर किसी मरीज की अस्पताल में भर्ती होने और डिस्चार्ज होने के बीच मौत हो जाती है तो ऑडिट के बाद अस्पताल को इसका भुगतान किया जाता है।

 
स्वदेश दर्शन योजना पर भी उठे सवाल- 

अयोध्या विकास को लेकर बनाए जा रहे स्वदेश दर्शन योजना पर भी कैग ने सवाल उठाया है. कैग के मुताबिक इस परियोजना में ठेकेदारों को 19.73 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ दिया गया है. इस मामले का खुलासा होने के बाद से सियासी गलियारों में हंगामा मचा है. इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के 75 वर्ष के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।वरिष्ट नेता  जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री से पूरे मामले में चुप्पी तोड़ने के लिए कहा है. यह पहली बार नहीं है, जब कैग की रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पूर्व में कैग रिपोर्ट की वजह से मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी तक जा चुकी है. इतना ही नहीं, कैग की रिपोर्ट से बने भ्रष्टाचार के माहौल में UPA की पूरी मनमोहन सरकार ही चली गई थी

CAG रिपोर्ट में कई और खुलासे-


आपको बताते चलें कि संविधान में सरकारी खर्च की पड़ताल के लिए एक सरकारी एजेंसी बनाने का प्रावधान है. अनुच्छेद 148 के मुताबिक इस एजेंसी के प्रमुख की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, इसके  प्रमुख को उसी तरह से हटाया  जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के एक जज को संविधान के अनुच्छेद 149, 150 और 151 में कैग के कामकाज और शक्तियों के बारे में जिक्र किया गया है जिसको चाहें तो विस्तार से वहां पर भी पढ़ा जा सकता  है. कैग का काम सभी सरकारी संस्थाओं का ऑडिट करना और उसकी रिपोर्ट संसद या विधानसभा के पटल पर रखना होता है. वर्तमान में कैग 2 तरह से ऑडिट करता है. पहला-रेग्युलेरिटी ऑडिट और दूसरा -परफॉर्मेंस ऑडिट.रेग्युलेरिटी ऑडिट को कम्पलायंस ऑडिट भी कहते हैं. इसमें सभी सरकारी दफ्तरों के वित्तीय ब्यौरे का विश्लेषण किया जाता है. विश्लेषण में मुख्यत: यह देखा जाता है कि सभी नियम-कानून का पालन किया गया है या नहीं? 2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला रेग्युलेरिटी ऑडिट की वजह से ही उठा था. इसी तरह परफॉर्मेंस ऑडिट में कैग के द्वारा यह पता लगाया जाता है कि क्या सरकारी योजना शुरू करने का जो मकसद था, उसे कम खर्च पर सही तरीके से किया गया है या नहीं? इस दौरान योजनाओं का बिंदुवार विश्लेषण किया जाता है।

कैग रिपोर्ट से देश में क्या पड़ा-

सितंबर 2001 में कैग ने गुजरात को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. रिपोर्ट में कहा गया कि गुजरात के तत्कालीन  मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल बिना वजह 2 बार विदेश यात्रा पर गए. इस दौरान वो अपने 2 करीबी अधिकारियों को भी साथ ले गए, जो वहां मनोरंजन के नाम पर लाखों खर्च कर आए. कैग ने मुख्यमंत्री के 2 करीबी अधिकारियों को सरकारी मद से खर्च रुपयों का भुगतान करने के लिए भी कहा.
रिपोर्ट आने के बाद गुजरात की सरकार हरकत में आ गई. केशुभाई पटेल की मीडिया टीम ने कैग के खिलाफ ही एक विज्ञापन निकलवा दिया. इसमें कहा गया कि मुख्यमंत्री निवेश लाने गए थे मगर कैग ने लोगों को गुमराह किया है। 


इस बीच कैग और सरकार की लड़ाई में विपक्ष भी कूद गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे छविदास मेहता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख पूरे मामले में एक्शन लेने के लिए कहा. गुजरात में इस प्रकरण के एक साल बाद ही विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित था. चिंतित बीजेपी ने आनन-फानन में गुजरात के नेताओं की बैठक बुलाई. इसी बैठक में केशुभाई पटेल के हटाने पर सबके बीच सहमति बनी। 


6 अक्टूबर 2001 को केशुभाई पटेल को अपना इस्तीफा देना पड़ा था  और फिर पटेल की जगह पर नरेंद्र मोदी को विधायक दल का नेता चुना गया. यानी गुजरात प्रदेश का मुख्यमंत्री


जब रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए-


1989 में वीपी सिंह की सरकार में रामविलास पासवान पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाए गए. मंत्री के रूप में उन्हें 12 जनपथ का बंगला दिया गया. 1991 में कैग की रिपोर्ट ने राम विलास पासवान के बंगले को लेकर एक रिपोर्ट जारी कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पासवान ने घर सजवाने के लिए तय रकम से ज्यादा रुपए खर्च कर दिए. रिपोर्ट में कहा गया कि पासवान को जब बंगला मिला तो EPFO ने अपने मद से साज-सज्जा के लिए लाखों रुपए खर्च कर दिए. EPFO की ओर से डबल बेड के लिए 10,945 रुपए, रंगीन टीवी के लिए 13,500 रुपए, पर्दे के लिए 52,300 रुपए दिए गए, जो गलत निर्णय था. कैग रिपोर्ट पर हंगामा मच गया और विपक्ष ने ईमानदार राजनीति की बात करने वाले पूर्व पीएम वीपी सिंह को निशाने पर ले लिया. जानकारों का कहना है कि रामविलास पासवान के मामले में सिंह बैकफुट पर आ गए, क्योंकि पासवान उनके काफी करीबी थे. 1991 में वीपी सिंह की पार्टी को चुनाव में करारी हार मिली. सिंह ने इसके बाद 10 साल तक कोई भी पद नहीं लेने का अघोषित वादा कर लिया।

2014 के चुनाव में क्यों हारी थी मनमोहन सरकार-


2010 में कैग ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2G स्पैक्ट्रम के आवंटन में धांधली की गई है. यह आवंटन साल 2008 में किया गया था.  कैग के मुताबिक 2G आवंटन में धांधली की वजह से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.  उस वक्त दूरसंचार विभाग डीएमके के सांसद ए. राजा के पास था. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ए. राजा ने स्पैक्ट्रम आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री कार्यालय की सलाहों को नजरअंदाज कर दिया था . मामला सामने आने के बाद बीजेपी ने संसद में मनमोहन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आनन-फानन में मनमोहन सिंह ने सीबीआई से जांच कराने की बात कही. सीबीआई ने शुरुआती जांच के बाद ए.राजा को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद उन्हें कैबिनेट से भी हटा दिया गया. हालांकि, बाद में सीबीआई मामले को साबित नहीं कर पाई और कोर्ट से ए.राजा को क्लीन चिट मिल गई.2-जी स्पैक्ट्रम के बाद कैग ने कोल आवंटन पर भी सवाल उठा दिया. लगातार घपले-घोटाले सामने आने के बाद सरकार बैकफुट पर चली गई.  इसी बीच अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल बनाने की मांग शुरू हो गई . इसने भी कांग्रेस सरकार को काफी डेमेज किया, दूसरी तरफ सीएजी रिपोर्ट के बाद बीजेपी अटैकिंग मोड में और कांग्रेस डिफेंसिव मोड में चली गई, जिसका असर 2014 के चुनाव पर हुआ और मनमोहन सरकार बुरी तरह हार गई। 


अब मोदी सरकार भी कटघरे में-

ये तमाम चीजें हैं जो मनमोहन सरकार की तरह मोदी सरकार को भी कटघरे में खड़ा करती हैं, लेकिन मेन स्ट्रीम मीडिया ने इस पर एक हल्की सी रिपोर्ट दिखाकर और चार लाइनों की खबर लिख कर इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया,यही कारण है कि मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते हैं, सरकार का पक्ष लेने और सरकार से सवाल न पूछने के कारण अब ऐसे मीडिया समूह को कई जगहों पर बायकॉट किया  जाता है, और उसके उलट सोशल मीडिया और यू ट्यूब के जरिये कई स्वतंत्र पत्रकार लगातार सरकार से सवाल कर रहे हैं जिससे उनकी एक अलग पहचान भी बन रही है। 

 

नरेंद्र मोदी का गिरता और योगी आदित्यनाथ का बढ़ता ग्राफ…

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भारतीय जनता पार्टी को साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला. करीब 15 साल बाद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.. सरकार का मुखिया कौन होगा यानी मुख्यमंत्री कौन बनेगा,, इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने थे. लेकिन, फ़ाइनल मुहर लगी योगी आदित्यनाथ के नाम पर.. बहुत से लोगों के लिए ये फैसला एक ‘सरप्राइज़’ था. योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की रेस कैसे जीती,, ये सवाल आज तक पूछा जाता है,,,  तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने भी कुछ साल पहले इसका ज़िक्र किया था, अमित शाह ने तब कहा था कि “जब योगी जी को मुख्यमंत्री बनाया तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि योगी जी मुख्यमंत्री बनेंगे. कई सारे लोगों के फोन आए कि योगी जी ने कभी म्युनिसिपलिटी भी नहीं चलाई. वास्तविकता भी यही थी. कि नहीं चलाई थी. योगी जी कभी किसी सरकार में मंत्री तक नहीं रहे.” अमित शाह के मुताबिक उस वक्त उनसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ अलग सलाह दी गई थी, “योगी जी संन्यासी हैं, पीठाधीश हैं और इतने बड़े प्रदेश का आप उनको मुख्यमंत्री बना रहे हो.

क्या कहती हैं राधिका रामाशेषन- 

7 साल बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है. अब योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराधिकारी तलाशने वालों की संख्या बढ़ती नज़र आ रही है,, ऐसे लोगों में सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ के उत्साही समर्थक नहीं हैं. बीजेपी के कई कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक भी दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कद पार्टी में अपने समकालीन नेताओं से काफी ऊंचा हो गया है… भारतीय जनता पार्टी की राजनीति पर वर्षों से करीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामा शेषन कहती हैं, “दिल्ली में अक्सर हमें दोनों का पोस्टर देखने को मिलता है, मोदी और योगी. योगी जी का स्टेटस  पार्टी में दूसरे नंबर का हो गया है. उन्होंने सबको पीछे छोड़ दिया है.

सवाल ये भी-


ऐसे में ये भी सवाल उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ को अब नरेंद्र मोदी की ज़रूरत नहीं है? इस सवाल का जवाब कई बातों से भी मिलता दिखाई देता है, योगी आदित्यनाथ का  असर ज़मीन पर भी दिखता है. मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले योगी आदित्यनाथ पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके थे लेकिन कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि तब उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित था… मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के कामकाज ने जिस यूपी मॉडल को खड़ा किया, उसकी चर्चा अब उसी तरह होती है जैसे साल 2014 के पहले बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का ज़िक्र करते थे.. योगी आदित्यनाथ ने अपना काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक में जब बीजेपी की सरकार थी तब वहां के नेता भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र करते रहते थे.”

क्या कहते हैं ये राजनीतिक विश्लेषक-

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिलने वाली कामयाबी की वजह से हर तरफ योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ की बात हो रही है… उत्तर प्रदेश की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में प्रदेश में बीजेपी को मिले चुनाव नतीजों के जरिए उनका मूल्यांकन हो रहा है,, किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन रिजल्ट से होता है. योगी आदित्यनाथ के साथ भी यही बात है. वो 2017 में सत्ता में आए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अच्छा रिजल्ट दिया. तब सपा, बसपा और आरएलडी का गठबंधन था… उस गठबंधन के मुक़ाबले 64 सीट जीतना  बड़ी उपलब्धि थी.. जबकि तब लोगों को लग रहा था कि बीजेपी का सफाया हो जाएगा. उसके बाद आया 2022 का विधानसभा चुनाव… दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना निश्चित तौर पर एक बड़ी बात थी… फिर अभी निकाय चुनाव हुए,, बीजेपी ने सारे बड़े शहरों में क्लीन स्वीप किया. ये रिपोर्ट कार्ड है योगी आदित्यनाथ का, जिसने उनको राष्ट्रीय नेताओं की कतार में मोदी के समकक्ष खड़ा कर दिया।
काबिले तारीफ़ हैं योगी-


‘योगी आदित्यनाथ. रिलीजन, राजनीतिक और पावर, द अनटोल्ड स्टोरी ‘ किताब के लेखक और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कई दशक से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि आज की तारीख में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ दूसरे सभी नेताओं से आगे हैं.. वो कहते हैं, “जहां तक यूपी का सवाल है यहां नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा योगी आदित्यनाथ का असर है. नरेंद्र मोदी 2024 में जहां फिर से पहुंचना चाहते हैं, उसके लिए यूपी ज़रूरी है और योगी भी. इसमें कोई शक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने आपको जिस तरह से आगे बढ़ाया है, वो काबिले तारीफ है.”

गुजरात मॉडल  की तर्ज पर है यूपी मॉडल-


योगी आदित्यनाथ और यूपी मॉडल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.. लेकिन ‘यूपी मॉडल’ है क्या ? योगी जी का यूपी मॉडल है कानून व्यवस्था और विकास.. साथ में हिंदुत्व का तड़का. यानी हिंदुत्व के तड़के के साथ विकास और कानून व्यवस्था पर फोकस करना… नरेंद्र मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ की ही तरह योगी आदित्यनाथ के ‘यूपी मॉडल’ में भी सबसे मुख्य बात हिंदुत्व है… जैसे गुजरात मॉडल का मेन फ़ीचर विकास, इन्फ्रा स्ट्रक्चर और आर्थिक उन्नति थी, तो यहां यूपी मॉडल में कानून व्यवस्था मुख्य स्तंभ है… विकास की बात उसके बाद आती है.. कानून  व्यवस्था के मामले में योगी  ने काफी प्रभाव छोड़ा है. मध्य प्रदेश और कर्नाटक भी यूपी मॉडल का काफी ज़िक्र कर रहे थे… वो कह रहे थे कि कोई क़ानून हाथ में ले या उल्लंघन करे तो एक ही उपाय है, ‘बुलडोजर चलना’…  बुलडोज़र योगी आदित्यनाथ की सरकार का एक सिंबल बन गया है. हालांकि, योगी आदित्यनाथ के इस ‘यूपी मॉडल’ को लेकर आलोचक लगातार सवाल उठाते रहे हैं.. योगी आदित्यनाथ की अभी मेन USP  क्या है, जिसे दूसरे लोग भी कॉपी कर रहे हैं, खासकर बीजेपी शासित राज्य चाहे मध्य प्रदेश हो या असम वाले मुख्यमंत्री,, किसी ने कुछ गड़बड़ की, भले ही वो प्रूफ नहीं हुआ हो, केस चल रहा हो, ये कहते हैं कि उसे बुलडोज़ कर दो. बकायदा ऐसी भाषा बोलते हैं. ये क़ानून के मुताबिक नहीं है.. अगर आप देश के कानून को ताक पर रखकर अपना क़ानून चलाएंगे तो कुछ दिन तो अच्छा लगेगा लेकिन जब गाज आम आदमी पर गिरने लगेगी तो फिर लोग इस पर भी सवाल उठाने शुरू करेंगे। योगी आदित्यनाथ ने अपना एक प्रोफ़ाइल बना लिया है कि भई ये है सॉलिड आदमी, ये तुरंत तय करता है,  योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के जरिए तरक्की की है. मोदी का मॉडल फोलो किया है,

अपने तौर पर ही करेंगे काम- योगी 


वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आलोचक भले ही कुछ भी कहें. योगी आदित्यनाथ का मॉडल एक ख़ास तरह से ही काम करता है.. राधिका रामाशेषन कहती हैं कि योगी आदित्यनाथ के यूपी मॉडल में एक और ख़ास बात है जो बीजेपी शासित किसी और राज्य में दिखाई नहीं देती… और वो है कि योगी आदित्यनाथ अन्य बीजेपी नेताओं की तरह केंद्र  की हर बात आंख मूंदकर नहीं मानते.. 2017 में मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी जी की पहली पसंद मनोज सिन्हा माने जाते  थे. केशव प्रसाद मौर्य जैसे कुछ और नाम चल रहे थे.. लेकिन अंत में योगी सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे.. नोट करने वाली बात है कि पहले दिन से उन्होंने ये सिग्नल भेजा कि वो दिल्ली से निर्देश और आदेश नहीं लेने वाले हैं.. वो खुद अपने तौर पर ही राज चलाएंगे.. भले ही ये दिल्ली को पसंद न आया हो.. कई ऐसे उदाहरण हैं जब दिल्ली और लखनऊ के बीच में टेंशन हुई है.. ” उसका नजारा इस बात से दिखाई देता है, जब  “अरविंद शर्मा गुजरात में मोदी जी के पसंदीदा अधिकारी थे. उन्होंने इस्तीफा दिया और उन्हें MLC बनाया गया.. बहुत प्रयास हुआ कि 2022 विधानसभा चुनाव के पहले उन्हें मंत्री बनाया जाए.. ख़बर यहाँ तक आयी  कि उनके लिए एक बंग्ला भी कालिदास मार्ग पर देखा गया था, लेकिन योगी जी अड़े रहे और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में नहीं लिया. अभी वो मंत्री हैं लेकिन उनकी ज़्यादा चर्चा नहीं है. केशव प्रसाद मौर्या भी समानांतर खड़ा करने का प्रयास हुआ लेकिन वो भी सफल नहीं हो पाए हैं. “

 

एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा है-

 

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान दावा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने आज “ऐसी पोजिशनिंग कर ली है कि वो अपनी ही पार्टी में कई लोगों की आंख का कांटा बन गए हैं.. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ के मॉडल में एक और बात है जो उन्हें मौजूदा दौर के दूसरे नेताओं से अलग करती है…योगी आदित्यनाथ के आलोचक उन्हें एक ख़ास जाति का समर्थक बताते हैं लेकिन ये आरोप का उनके राजनीतिक ग्राफ पर असर होता नहीं दिखता.. इसकी वजह है,, उनका भगवा परिधान.. वो गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं. वो भले ही सवर्ण हैं लेकिन उस पीठ की Following पिछड़ों में काफी है. दूसरे भगवा वेश की वजह से पिछड़े नेतृत्व की बात डाइल्यूट हो जाती है.. फिर यूपी में अब मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के कद का कोई पिछड़ा नेता भी नहीं है. मायावती का दलितों में आधार घट रहा है.”यूपी में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान से ही ओबीसी और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है. बीजेपी उन्हें पद भी देती है, जैसे केशव मौर्या उपमुख्यमंत्री हैं. वो योगी आदित्यनाथ के भी साथ है.

योगी की अगली परीक्षा 2024 चुनाव में-


उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में विपक्ष को हाशिए पर धकेलने वाले योगी आदित्यनाथ की अगली परीक्षा साल 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान होगी.. तब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ विपक्षी दलों के लिए बहुत कुछ दांव पर होगा.. उस वक्त योगी आदित्यनाथ और उनका मॉडल बीजेपी के लिए कितना अहम होगा? इस सवाल पर पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, “कि योगी आदित्यनाथ ने  support base सॉलिड बना लिया है. विपक्ष बिल्कुल कमज़ोर है.. अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व प्ले करने लगे हैं. ये भी योगी के हक में जाता है, जब आप दूसरे की पिच पर खेलेंगे तो कैसे जीतेंगे.”

योगी का सबसे बड़ा एडवांटेज

 

वहीं, राजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में आगे भी बीजेपी मौजूदा रास्ते पर ही चलेगी… यूपी में कोई बड़ी चुनौती बीजेपी के सामने नहीं है..  2019 का आपको ध्यान है, तब सपा बसपा और आरएलडी का गठबंधन था लेकिन बीजेपी बहुत आगे रही.” राजेंद्र सिंह कहते हैं, “सरकार बनी तो मोदी पीएम होंगे. योगी आदित्यनाथ भी उनका गुणगान करते हैं. जब कभी मोदी हटेंगे तब सवाल भले उठ सकता है..
यूपी के अंदर विधानसभा में योगी नंबर वन हैं, लेकिन लोकसभा के लिहाज से अभी भी शायद मोदी नंबर वन हैं.. 2024 में अगर बीजेपी को पहले से ज्यादा सीटें मिली तो मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे, थोड़ा कम भी हो तो भी मोदी होंगे. योगी आदित्यनाथ अगर अपना दावा पेश भी करते हैं तो किन परिस्थितियों में करेंगे,, ये देखना होगा,, योगी आदित्यनाथ अभी सिर्फ़ 51 साल के हैं और ये उनका एडवांटेज है.

 

प्रधानमंत्री मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के लिए आखिर ऐसा क्या कहा की मुख्य न्यायाधीश ने दिया ऐसा रिएक्शन…

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भारत आज 77 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लाल किले की प्राचीर से दसवां स्वतंत्रता दिवस पर भाषण दिया। आज सभी न्यूज़ चैनल से लेकर सभी स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया प्रधानमंत्री के भाषण की व्याख्या की किसी ने प्रधानमंत्री के भाषण को अच्छा और किसी ने निराशाजनक बताया। लेकिन आज हम इस भाषण को न ही सही और न ही गलत बता रहे हैं ,बल्कि हम आज आपको प्रधानमंत्री के भाषण की मुख्य बातों को बताएंगे, आपको इस खबर में ये बताएँगे कि प्रधानमंत्री के भाषण में किस चीज को कितनी बार दोहराया गया.
 
प्रधानमंत्री मोदी ने की सुप्रीम कोर्ट की सराहना- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले की प्राचीर से देश की जनता को 10 वीं बार सम्बोधित किया,  इस दौरान उन्होंने मणिपुर से लेकर परिवारवाद तक का अपने भाषण में जिक्र किया। वहीं पीएम ने अदालती फैसलों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सराहना की। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे, उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को हाथ जोड़कर स्वीकार किया और अभिवादन किया। पीएम मोदी ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट को भी धन्यवाद देता हूं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने अक्सर अदालतों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। गणतंत्र दिवस और अपने स्थापना दिवस को और यादगार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को एक हजार से ज्यादा फैसलों का दस भाषाओं में अनुवाद जारी कर इसकी शुरुआत की थी,
 
 
PM ने कई बार किया इन विषयों का जिक्र- 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को 10वीं बार संबोधित किया. 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी  ने 48 बार परिवारजन, 43 बार सामर्थ्य का इस्तेमाल किया. वहीं, महिलाएं/नारी शब्द का इस्तेमाल 35 बार किया.. इसके अलावा पीएम मोदी ने अपने संबोधन में 19 बार संकल्प शब्द बोला,,जबकि आजादी 16 बार,, पीएम मोदी के भाषण में युवाओं का 12 बार जिक्र आया.. जबकि 5 बार उन्होंने सामाजिक न्याय की बात कही.  90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने 12 बार परिवारवाद, 11 बार भ्रष्टाचार और 8 बार तुष्टिकरण का जिक्र किया. पीएम ने मणिपुर मुद्दे का जिक्र करते हुए कहा कि पूरा देश मणिपुर के साथ खड़ा है. पिछले कुछ दिनों से जो शांति बनाकर रखी है, मणिपुर के लोग उसे आगे बढ़ाएं। ‘अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार प्राकृतिक आपदा ने देश के अनेक हिस्सों में अकल्पनीय संकट पैदा किए है। जिन्होंने इसे सहा, उनके प्रति मैं गहरी संवेदना प्रकट करता हूं। 
 
 
क्या कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने-
 
प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘इस कालखंड में हम जो करेंगे, जो कदम उठाएंगे, त्याग करेंगे, तपस्या करेंगे, आने वाले एक हजार साल का देश का स्वर्णिम इतिहास उससे अंकुरित होने वाला है। पीएम मोदी ने आगे कहा कि अगली बार 15 अगस्त को इसी लाल किले से मैं आपके सामने देश की उपलब्धियां, आपके सामर्थ्य, उसमें हुई प्रगति और सफलता के गौरव गान को इससे भी अधिक आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करूंगा। उन्होंने कहा कि अगली बार इसी लाल किले पर और अधिक आत्मविश्वास के साथ आऊंगा। उन्होंने कहा कि मैं साल 2014 में परिवर्तन का वादा लेकर आया था। देश के 140 करोड़ लोगों ने मुझ पर भरोसा किया। रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफर का वादा विश्वास में बदल गया। मैंने इस वादे को विश्वास में बदल दिया है। 
 
 
विपक्ष ने किया पलटवार-
 
इस मौके पर पक्ष-विपक्ष के नेता और सांसद लाल किले पर पहुंचे थे, वहीं एक कुर्सी भी खाली दिखाई दी। ये कुर्सी कांग्रेस के एक बड़े नेता की थी। ये सीट राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की थी। वो पीएम मोदी का भाषण सुनने नहीं पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई। हालांकि, कांग्रेस ने इस पर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि खरगे को ठीक महसूस नहीं हो रहा था, इसलिए वो लाल किले पर नहीं पहुंचे। 90 मिनट के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने ऐलान किया कि वे 2024 में भी लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे. पीएम मोदी के इस बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राजद चीफ लालू यादव ने पलटवार किया है. खड़गे ने कहा कि मोदी झंडा तो फहराएंगे, लेकिन अपने घर पर. लालू ने कहा कि ये आखिरी बार है. 
 पीएम मोदी ने अगले 5 साल की दी गारंटी-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार स्वतंत्रता दिवस पर अपने परिधान और वेशभूषा को लेकर चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा उनके साफा बांधने का अंदाज सबसे ज्यादा आकर्षक होता है। हर ध्वजारोहण में प्रधानमंत्री अलग-अलग रंगों की पगड़ी पहन कर ध्वजारोहण कर चुके हैं,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से देश के सामने अपनी सरकार के नौ साल का बही खाता रखा। 2024′ से पहले ही मोदी ने अगले पांच साल की गारंटी भी दे दी। उन्होंने कहा, हम आज जो शिलान्यास कर रहे हैं, उनका उद्घाटन भी मेरे नसीब में है। बतौर मोदी, अगले स्वतंत्रता दिवस पर मैं आपके सामने अपनी सरकार की सफलता का रिपोर्ट कार्ड पेश करूंगा।
 प्रधानमंत्री मोदी ने 10वीं बार किया सम्बोधित- 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक कुल 10 बार लाल किले से देश को संबोधित कर चुके हैं। केवल एक बार उन्होंने देश को एक घंटे से कम समय के लिए संबोधित किया। 2017 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण केवल 56 मिनट का रहा था। ये उनका अब तक का सबसे छोटा भाषण है। प्रधानमंत्री ने जब साल 2014 में देश को पहली बार लाल किले से संबोधित किया तो उन्होंने कुल 65 मिनट तक भाषण दिया। इसके बाद, साल 2015 में उन्होंने 86 मिनट तक देश को संबोधित किया। देश जब आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा था, उस दौरान पीएम मोदी ने देश को लाल किले से 94 मिनट तक संबोधित किया। यह उनके प्रधानमंत्री के रूप में रहने के दौरान लाल किले से दिया गया सबसे लंबा भाषण है। पीएम मोदी ने 2017 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 57 मिनट, 2018 में 82 मिनट और 2019 में 92 मिनट तक देश को संबोधित किया।  इसके बाद 2020 में 86 मिनट, 2021 में 88 मिनट, 2022 में 83 मिनट और 2023 में 90 मिनट तक पीएम मोदी ने लाल किले से भाषण दिया।
 
सबसे ज्यादा बार किस ने फहराया तिरंगा-
 
जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। लाल किले की प्राचीर से सबसे ज्यादा बार तिरंगा झंडा लहराने का अवसर उन्हें ही मिला था। नेहरू 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले पर रिकॉर्ड 17 बार झंडा फहराया। इस मामले में दूसरे नंबर पर भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री और जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी हैं। उन्होंने लाल किले पर 16 बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया है। 

 

मणिपुर की आग से 24 तबाह, दक्षिण में ढहता भाजपा का किला…   

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मणिपुर हिंसा का भाजपा की दक्षिण की राजनीति पर असर दिखना शुरू हो गया है, वो लोग, जिन्हें उनके समुदाय के नेताओं के ये कहने से कोई आपत्ति नहीं थी कि बीजेपी से अल्पसंख्यकों को कोई दिक्कत नहीं है, उनके  सुर भी अब पूरी तरह से बदलते हुए दिखाई देते हैं,  पिछले कुछ हफ्तों से इस समुदाय के लोग मणिपुर में हो रहे हमलों, हत्याओं और चर्चों को जलाए जाने के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं जिनमें से कुछ प्रदर्शन ऐसे हैं जिनकी अगुवाई खुद वहां के पादरियों ने की है और लगातार कर भी रहे हैं. राज्य में चर्चों का प्रशासन देखने वाली संस्था केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (केसीबीसी) ने तो यहां तक कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतने समय तक क्यों चुप्पी साधे रखी,, कुल मिलाकर केरल में जो समुदाय भाजपा के साथ दिखाई देता था अब वो उनसे दूरी बनाने लगा है। केरल ही नहीं, अब के हालात में मणिपुर में रहने वाले अधिकतर नागरिक जो या तो कुकी समुदाय से हैं या फिर मैतई से, कहीं न कहीं ये दूरी उनके मन में भी होगी, ऐसा वहां के हालात को देखकर महसूस किया जा सकता है

 

मणिपुर मामले जब फिर कुछ नहीं बोले PM-  
 
100 दिन से अधिक समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार 36 सेकंड और दूसरी बार तकरीबन 3 मिनट से कम समय ही निकाला है मणिपुर के मुद्दे पर बोलने के लिए, ये माना जा रहा था की संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी बोलेंगे तो न केवल मणिपुर के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रित होकर अपना भाषण देंगे बल्कि उम्मीद ये भी की जा रही थी कि तुरंत कोई बड़ा कदम उठाकर मणिपुर की जनता के जख्मों पर मरहम भी रखेंगे, पर न तो वहां हुई मौत के आंकड़ों पर और न ही नग्न अवस्था में परेड करवाई गयी महिलाओं के प्रति कोई गंभीर संवेदना दिखाई दी. अपने भाषण के दौरान उन्होंने ये जरुर कहा की अमित भाई यानी देश के गृहमंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सब कुछ पहले ही बोल चुके हैं
 2024 चुनाव में डाल सकता है असर- 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा भाषण हंसी-ठट्टे, कांग्रेस को कोसने, विपक्षी दलों की असफलता, इंडिया को घमंडिया कहने में ही गुजर गया. सत्ता पक्ष का ये रवैया 2024 के लोकसभा चुनाव में खासा असर डाल सकता है. खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में जहां पर अल्पसंख्यकों की यानी ईसाइयों की संख्या थोड़ी ज्यादा है.  गौरतलब है की इन अल्पसंख्यकों के वोट बैंक पर बहुत पहले से भाजपा की नजर रही है, और इस वोट बैंक को हासिल करने में पूर्व में भाजपा कामयाब भी हुई है, मगर हालात अब थोड़े जुदा हैं. याद कीजिए जब एक वक्त ऐसा भी था की प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों पर जीत के बाद अपनी सरकार बनाने के बाद कहा था, पूर्वोत्तर न दिल्ली से दूर है ना मेरे दिल से… पर 100 दिन से भी अधिक समय तक मणिपुर से दूरी बनाना ये संकेत जरुर देता है की दिल और दिल्ली दोनो से कम से कम मणिपुर से तो दूर ही है ।   


क्या कहती है BBC की रिपोर्ट- 

बीबीसी की एक  रिपोर्ट के अनुसार केरल के लोगों का कहना है कि “मणिपुर के लोग इसी भारत के सम्मानित नागरिक हैं. उनके घर जला दिए गए हैं और अब दिखाने के लिए उनके पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं बचा है हालात ये हैं कि वो भारतीय हैं. ये साबित करना भी अब उनके लिए मुश्किल हो सकता है, आखिर वो अपनी पहचान कैसे साबित करेंगे बिना कागजों के, अपनी ही ज़मीन पर बाहरी होते ये लोग दोनो तरफ से हैं चाहे फिर वो कुकी समुदाय हो या फिर मैतई… ”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईसाई समुदाय में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  के मजबूत आधार में सेंध लगाने के लिए बीजेपी के मेलजोल कार्यक्रम को केरल में ‘तगड़ा झटका’ लगा है.आपको बता दें कि राज्य में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 46% है, जिसमें 26.56% मुसलमान और 18.38% ईसाई हैं

एक ऐसा भी समय रहा है, जब सीपीएम नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) इन दोनों समुदायों से वोट हासिल करने में सफल रहा. लेकिन आम तौर पर अल्पसंख्यकों का वोट यूडीएफ के साथ ही रहा है. बीजेपी इसी में सेंध लगाने की कोशिश में थी, जिसमे वो काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही थी,लेकिन मणिपुर की हिंसा ने इन कोशिशों पर मानो पानी फेर दिया है।


क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक- 

राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन के अनुसार, “मणिपुर निश्चित रूप से बीजेपी के लिए एक झटका है, जो कि ईसाई वोटरों को रिझाने की कोशिश करती रही है. पिछले कुछ समय से वे इस ओर अच्छी खासी सफलता भी हासिल करती दिखाई दे रही थी. ”एमजी राधाकृष्णन कहते हैं, “अभी पिछले ईस्टर में ही कार्डिनल जॉर्ज एलेनचेरी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि बीजेपी बहुत अच्छी है और अल्पसंख्यकों को इस पार्टी से कोई दिक्कत नहीं है. इससे पहले एक और बिशप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर केंद्र सरकार रबर की सही कीमत दिलाए तो केरल से एक बीजेपी सांसद भेजा जा सकता है


2024 चुनाव में बीजेपी को लग सकता है झटका-

पूर्वोत्तर राज्यों में अल्पसंख्यक वोट कितने महत्वपूर्ण हैं उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईसाई समुदाय को अपनी तरफ लाने के अभियान की बागडोर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाथ में ले रखी थी. चाहे वो पोप फ़्रांसिस को भारत आमंत्रित करना हो या मलंकारा चर्च में 400 साल पुराने विवाद को हल करने की कोशिश हो या इसी साल अप्रैल में केरल में आठ प्रमुख चर्चों के प्रमुखों के साथ डिनर हो.  इसी डिनर में भारत के सबसे बड़े सायरो मालाबार चर्च के प्रमुख कार्डिनल एलेनचेरी ने प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी. इसके बाद ही एक के बाद एक बिशप ने विवादास्पद बयान दिए थे. एक बिशप ने ईसाइयों को ‘नार्को टेररिज़्म’ के भ्रम में फंसने को लेकर चेताया था जबकि दूसरे ने लव जिहाद को लेकर सावधानी बरतने की बात कही थी.लेकिन लगता है मणिपुर हिंसा ने इन सब कोशिशों पर एक झटके में पानी फेर दिया है।


मणिपुर की घटना से बीजेपी को झटका- 

एमजी राधाकृष्णन ने कहा कि समुदाय में बीजेपी समर्थक रवैया दिखाई देता रहा है. समुदाय के ख़ासकर संपन्न लोगों में सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिया अभियान चल रहा है और समाज में बीजेपी के प्रति नरम रुख साफ़ दिखता है.. वो कहते हैं, “कुल मिलाकर बीजेपी बहुत आरामदायक स्थिति में थी. लेकिन अब मणिपुर की घटना ने उन्हें झटका दिया है, चर्च सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ गए हैं.और अब  इस रिश्ते में अब बड़ी बाधा खड़ी हो गई है.”  राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “इस हालात में ईसाई समुदाय में बीजेपी का प्रचार ठप पड़ सकता है क्योंकि ईसाई नेतृत्व सार्वजनिक रूप से बीजेपी का समर्थन करने का बहाना नहीं ढूंढ पाएंगे.”“मणिपुर की घटनाओं से अब एक जटिल स्थिति पैदा हो गई है. एक छोटा समूह था जो बीजेपी की ओर झुकाव रख रखा था. अब उन्हें फिर से अपना मन बनाना पड़ेगा कि वो बीजेपी के साथ हैं या नहीं

क्या कहते हैं लेखक राधाकृष्णन-

लेखक और एकेडमिक केएस राधाकृष्णन कहते हैं कि “ईसाई समुदाय के पास किसी भी संगठन या विचारधारा के साथ स्थायी राजनीतिक वफादारी नहीं है. वे अपने हित देखते हैं. अगर वे सोचते हैं कि बीजेपी उनका शुभचिंतक है तो वे उसका समर्थन कर देंगे. अगर ये उनके लिए फायदेमंद होगा तो वो बीजेपी के साथ चले जाएंगे.” उनके मुताबिक, “ईसाई समुदाय कांग्रेस और एलडीएफ दोनों का समर्थन कर चुका है. इन सबके बीच कांग्रेस परिस्थितियों पर बारीक नज़र बनाए हुए है. एर्नाकुलम से कांग्रेस के सांसद हिबी इडेन ने कहा, “मणिपुर के बाद, बीजेपी का समर्थन करने वाले कुछ ईसाई नेता समझ गए कि उस पार्टी का अल्पसंख्यकों के प्रति यही बुनियादी बर्ताव है.”

एमजी राधाकृष्णन का कहना है कि ईसाई समुदाय में बीजेपी समर्थक कूटनीतिक रूप से कम मुखर रहेंगे. जब मणिपुर मुद्दा खत्म हो जाएगा, वे बीजेपी के साथ जाने का कोई और बहाना ढूंढ लेंगे. लेकिन 2024 के लिए तो ये मुश्किल होगा क्योंकि अब बहुत समय बचा नहीं है. इसलिए सार्वजनिक रूप से वो कोई पक्ष नहीं लेंगे.  फ़ादर जैकब पालाकाप्पिल्ली कहते हैं, “मणिपुर के हालात के बारे में हम बहुत दुखी और सदमे में हैं. प्रधानमंत्री ने पीड़ितों को ढांढस तक नहीं बंधाया. शांति के लिए हम किस से कहेंगे


पूरे देश में मणिपुर हिंसा का असर- 

ये वो तमाम घटनाक्रम और बयान है जो बताते हैं कि मणिपुर में हिंसा का असर अब राजनीतिक रूप से भी दिखना शुरू हो गया है,  और साथ ही  2024 में बीजेपी को यहां झटका लग सकता है। भाजपा दक्षिणी राज्यों में अपना आधार पहले ही खोती दिखाई दे रही है. और मणिपुर की घटना से पूर्वोत्तर में भी वोट बैंक पर असर पड़ना तय माना जा रहा है.सिर्फ दक्षिण ही नहीं बल्कि देश के कई ऐसे राज्य जहां पर अल्पसंख्यक बहुतायत में हैं याद रहे ये अल्पसंख्यक कहने से मतलब सिर्फ मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र ही नहीं बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है.. क्योकिं मणिपुर हिंसा से सरकार की छवि न केवल आसपास के राज्यों में खराब हुई है बल्कि पूरे देश मे इसका असर पड़ा है, जैसे केरल में ये असर देखने को मिल रहा रहा है. मोदी सरकार से पहले ही किसान, बेरोजगार, महंगाई से त्रस्त लोग नाराज हैं

 

2024 लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं ये सभी मुद्दे…

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बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार. ‘हम मोदी जी को लाने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं..  2014 के लोकसभा चुनाव में जब ऐसे नारे सामने आए तो कांग्रेस सरकार से नाखुश जनता को एक उम्मीद दिखी. उम्मीद कि मोदी सरकार आने के बाद वाकई उनके ‘अच्छे दिन’ आ जाएंगे. इसी उम्मीद से 17 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दे दिया. बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं. ये पहली बार था जब किसी गैर-कांग्रेसी पार्टी ने बहुमत हासिल किया था. 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.  2019 में दूसरी बार 23 करोड़ से ज्यादा लोगों ने बीजेपी को वोट दिया और  बीजेपी ने 303 सीटें जीतीं. नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.   प्रधानमंत्री मोदी ने 2025 तक भारत की GDP 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का टारगेट रखा है. हालांकि, अभी के हालात को देखते हुए ये टारगेट 2025  तक तो पूरा होना बहुत मुश्किल लगता है ।   

 
मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल- 

मोदी सरकार कुछ समय बाद फिर देश के आम चुनाव में उतरने वाली है तो तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने से पहले उनको जनता के कई सवालों के जवाब भी देने होंगे ? मोदी सरकार के इन 9 सालों के कार्यकाल पर नजर डालें तो कई ऐसे तथ्य  सामने आते  है, जो मोदी सरकार की नीतियों पर कई सवाल करती हैं,,, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावों में  डॉलर की गिरती कीमत को लेकर कांग्रेस सरकार को खूब घेरा था, कि आखिर भारत का रुपया डॉलर के मुकाबले को लेकर इतना क्यों गिर रहा है, लेकिन 2014 में 72 पर चल रहा डालर मोदी सरकार में आज 82 पर पहुंच गया है।

 
अर्थव्यवस्था का क्या हुआ ? 

मोदी सरकार इन 9 सालों में कई मोर्चों पर विफल नजर आती है, मोदी सरकार में विदेशी कर्ज भी देश पर खूब  बढ़ा है. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 25 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज भारत पर बढ़ा है. मोदी सरकार से पहले देश पर करीब 409 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज था, जो अब बढ़कर डेढ़ गुना यानी करीब 613 अरब डॉलर पहुंच गया है ।   

 
मोदी सरकार में बेरोजगारी का आंकड़ा- 

मोदी सरकार में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा रोजगार को लेकर सामने आता है, मोदी सरकार में बेरोजगारी दर जमकर बढ़ी है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक  बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर रखने वाली निजी संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी CMIE के मुताबिक, अभी देश में करीब 41 करोड़ लोगों के पास रोजगार है. जबकि  मोदी सरकार के आने से पहले 43 करोड़ लोगों के पास रोजगार था. यानी हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाली मोदी सरकार में रोजगार मिलने के बजाय उल्टा २ करोड़ रोजगार कम हो गए।

 
नौकरियों का क्या हुआ ? 

CMIE ने पिछले साल एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें दावा किया गया था कि भारत में अभी 90 करोड़ लोग नौकरी के लिए योग्य हैं. इनमें से 45 करोड़ लोगों ने तो अब  नौकरी की तलाश करना ही छोड़ दिया है. यानी कि इस देश के 45 करोड़ युवा इतने निराश हैं कि वो मान चुके हैं कि अब उनको नौकरी नहीं मिल पायेगी,, ये आंकड़ा निश्चित रूप से इस देश के भविष्य उन युवाओं की हताशा को दर्शाता है,,, 2019 के चुनाव के बाद सरकार के ही एक सर्वे में सामने आया था कि देश में बेरोजगारी दर 6.1% है. ये आंकड़ा 45 साल में सबसे ज्यादा था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मोदी सरकार के आने से पहले देश में बेरोजगारी दर 3.4% थी, जो इस समय बढ़कर 8.1% हो गई है. ये आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार किस तरह रोजगार के मुद्दे पर पूरी तरह विफल साबित हुई और आने वाले चुनावों में देश के युवा सरकार से इस पर जवाब मांगेंगे जो की सरकार की परेशानियां जरुर बढ़ाएगी।

शिक्षा पर मोदी सरकार के आंकड़े-

किसी भी देश के विकास के लिए अच्छी शिक्षा बहुत जरूरी है. मोदी सरकार में शिक्षा का बजट बढ़ा है,  9 साल में शिक्षा पर खर्च का बजट 30 हजार करोड़ रुपये  बढ़ा है. लेकिन देश में स्कूल भी कम हो गए हैं, शिक्षक भी बढ़े हैं लेकिन छात्र नहीं . मोदी सरकार के आने से पहले देश में 15.18 लाख स्कूल थे, जो अब घटकर 14.89 लाख हो गए हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक, देश में अभी भी करीब 30 फीसदी महिलाएं और 15 फीसदी पुरुष अनपढ़ हैं. 10 में से 6 लड़कियां 10वीं से ज्यादा नहीं पढ़ पा रही हैं. वहीं, 10 में से 5 पुरुष ऐसे हैं जो 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

 
मोदी सरकार में बेतहाशा बढ़ती महंगाई-

अब बात आती है देश के सबसे बड़े मुद्दे की,,जिस मुद्दे ने मोदी  को सत्ता के सबसे ऊँचे मुकाम पर पहुंचाया और भारतीय जनता पार्टी को अब तक का सबसे प्रचंड जनादेश दिलवाया,,, जी हाँ  ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का ये नारा था. जिसे पूरी भाजपा ने खूब जोर शोर से देश की जनता को सुनाया था लेकिन इसी मुद्दे पर सरकार सबसे ज्यादा मात खा रही है,,,  मोदी सरकार में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तो आग लग गई है. 9 साल में पेट्रोल की कीमत 24 रुपये और डीजल की कीमत 34 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा बढ़ी है. पेट्रोल-डीजल के अलावा गैस सिलेंडर की कीमत भी तेजी से बढ़ी है. मोदी सरकार से पहले सब्सिडी वाला सिलेंडर 414 रुपये में मिलता था. लेकिन अब सिलेंडर पर नाममात्र की सब्सिडी मिलती है. अभी रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 11 सौ रुपये तक पहुंच गई है. इतना ही नहीं, 9 साल में एक किलो आटे की कीमत 52%, एक किलो चावल की कीमत 43%, एक लीटर दूध की कीमत 56% और एक किलो नमक की कीमत 53% तक बढ़ गई है ।   

सभी चीजों पर बढ़ती महंगाई के आंकड़े- 

कुछ समय  पहले टमाटर के साथ सब्जियों के बढ़े दाम ने परेशानी बढ़ाई तो उसके बाद मसालों में आई तेजी ने खाने का स्वाद बिगाड़ दिया। वहीं अब दालों में भी महंगाई ने किचन का पूरा बजट ही गड़बड़ा दिया है। दालों के दाम में 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। इससे लोग खासे परेशान हैं। किराना स्टोर से मिले दामों को अगर मिलाया जाए तो बीते तीन महीने में दाल-चावल और आटे के दामों में काफी वृद्धि हुई है। तीन माह पूर्व 140 से 150 रुपये में बिकने वाली अरहर की दाल  180 रुपये तक पहुंच गई है। चना दाल भी 150 से 190 रुपये किलो के भाव पर बिक रही है। दालों के साथ-साथ आटा और चावल का रेट भी तीन महीने में करीब 10 से 20 प्रतिशत बढ़ा है। पांच किलो आटे के बैग की कीमत 225 रुपये है।  कुछ ऐसी स्थिति मसालों की भी है। मसालों में जीरे के दाम में सबसे ज्यादा 40 फीसदी वृद्धि हुई है। तीन महीने पहले 100 ग्राम जीरा जहां 45 रुपये का था। वहीं अब ये 360 रुपये प्रति किलो  तक पहुंच गया है।  गैस सिलेंडर पहले से महंगा है। वहीं, तेल, सब्जियों, मसालों के बाद अब दाल भी और महंगी हो गयी है। ऐसे में घर चलाने के लिए हर चीज में बजट कटौती नहीं की जा सकती। जिसका असर मसालों व दालों में भी देखने को मिल रहा है। आटा चावल में भी वृद्धि हुई है। टमाटर, अदरक समेत अन्य हरी सब्जियां महंगी थीं तो लोग दाल व मसालों से काम चला लेते थे, लेकिन अब ये भी महंगे हो गए हैं। ऐसे में आम और गरीब लोगों पर सबसे अधिक असर पड रहा है।

 

दिल्ली सर्विस बिल पर हारे केजरीवाल, गठबंधन ने दिखाई एकता…

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दिल्ली सर्विस बिल लोकसभा और राजयसभा में पास हो गया है,आप के लिए ये एक बड़ा झटका है लेकिन जिस तरह से आप के समर्थन में इंडिया गठबंधन ने एकजुटता दिखाई उससे सभी विपक्षी दल खुश जरूर होंगें,केजरीवाल सरकार के लिए ये बिल पास होना जहां एक बड़ा झटका है. लेकिन 10 सांसदों  की संख्या वाली आप पार्टी पार्टी ने जिस तरह 102 वोट राजयसभा में इस बिल के विरोध में हासिल किये उससे केजरीवाल जरूर खुश होंगें

 
समर्थन में 131 वोट और विरोध में 102 वोट- 

 सोमवार को राज्यसभा में इस बिल के समर्थन और विरोध में मतदान हुआ तो समर्थन में 131 वोट पड़े और विरोध में 102 वोट .   राज्यसभा में बीजेपी के पास अकेले बहुमत नहीं है. उसके एनडीए सहयोगियों को भी मिला दें तब भी बहुमत का आंकड़ा दूर रहता है.लेकिन ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी के बीजेपी के साथ आने से समीकरण बदल गए. राज्यसभा में जब बिल पास करने के लिए मतदान हो रहा था तो एक तस्वीर ने सबका ध्यान खींचा. राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी व्हील चेयर पर मौजूद थे.90 साल के मनमोहन सिंह काफ़ी कमजोर दिख रहे थे. इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर ट्वीट कर लोगों ने आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को भी निशाने पर लिया.कई लोगों ने लिखा कि जिस अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में अपनी जगह बनाने के दौरान मनमोहन सिंह को क्या-क्या नहीं कहा, वही मनमोहन सिंह उनके समर्थन में 90 साल की उम्र में अच्छी सेहत नहीं होने के बावजूद मौजूद रहे

केजरीवाल को मिला गठबंधन का पूरा समर्थन- 

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में महज़ 10 सांसद हैं लेकिन दिल्ली सर्विस बिल के विरोध में उसे 102 सांसदों का समर्थन मिला.मनमोहन सिंह की मौजूदगी को कांग्रेस के बीजेपी से दो-दो हाथ करने की प्रतिबद्धता से भी जोड़ा जा रहा है.इस बिल के समर्थन में इंडिया गठबंधन एकजुट रहा. इंडिया गठबंधन यानी इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूसिव अलायंस पिछले महीने ही बना था.इंडिया गठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी ने क्रॉस वोटिंग नहीं किया.अरविंद केजरीवाल को भले इंडिया गठबंधन का पूरा समर्थन मिला लेकिन उनकी पार्टी को गठबंधन के साथियों से तंज़ का भी सामना करना पड़ा

क्या कहा सांसद मनोज झा ने- 

राज्यसभा में बिल का विरोध करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया था और अब उन्हें सोचना चाहिए कि केंद्र सरकार दिल्ली सरकार के अधिकारों में सेंधमारी कर रही है, तो उन्हें कैसा लग रहा है.मनोज झा ने कहा, ”आम आदमी पार्टी को सोचना चाहिए कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में किसका साथ दिया था. अब उन्हें खुद ही भुगतना पड़ रहा है. जो इस बिल का समर्थन कर रहे हैं, उनकी वफादारी को भी हम समझते हैं. चूहे की पूँछ हाथी के पैर से दबा हो तो वफ़ादारी और मजबूरी में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है

कानून बनते ही दिल्ली सरकार के क्या-क्या अधिकार होंगे सीमित – 

लोकसभा और राज्यसभा में दिल्ली सर्विस बिल पास होने के बाद अब राष्ट्रपति के पास जाएगा और उनके हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा. इस कानून का असर दिल्ली के प्रशासन पर व्यापक रूप से पड़ेगा. इस बिल के कानून बनते ही दिल्ली सरकार के अधिकार सीमित हो जाएंगे और उपराज्यपाल के अधिकार और बढ़ जाएंगे.इस बिल से नेशनल कैपिटल सिविल सर्विस अथॉरिटी बनेगी और इसी के पास नौकरशाहों की पोस्टिंग और तबादले का अधिकार होगा. हालांकि इस कमेटी के मुखिया मुख्यमंत्री होंगे लेकिन इसमें मुख्य सचिव और दिल्ली के गृह सचिव भी होंगे. फैसला बहुमत से लिया जाएगा. मुख्य सचिव और गृह सचिव दोनों केंद्र के अधिकारी होंगे ऐसे में डर बना रहेगा कि बहुमत से फैसले की स्थिति में दोनों केंद्र की बात सुनेंगे. कमेटी के फैसले के बाद भी आखिरी मुहर उपराज्यपाल को लगानी होगी. ऐसे में एक चुनी हुई सरकार के अधिकार ज़ाहिर तौर पर कम होंगे

पार्टी के एक भी सांसद ने नहीं की क्रॉस वोटिंग-

दिल्ली सर्विस बिल पास होने से दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अधिकार भले सीमित हो गए हैं लेकिन राजनीतिक रूप से इंडिया गठबंधन यह संदेश देने में कामयाब रहा है कि वह बीजेपी को चुनौती देने के लिए एकजुट है. इंडिया गठबंधन के बने मुश्किल से एक महीना हुआ है और संसद के दोनों सदनों में यह गठबंधन पूरी तरह से एकजुट रहा. संसद के दोनों सदनों में आप की मौजूदगी बहुत अच्छी नहीं है, इसके बावजूद उसे अच्छा ख़ासा समर्थन मिला.कांग्रेस, डीएमके, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), आरजेडी, जेडीयू और इंडिया के बाकी साथियों का समर्थन मिला. राज्यसभा में बिल के विरोध में 102 वोट पड़ने का मतलब है कि इंडिया गठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी के एक भी सांसद ने क्रॉस वोटिंग नहीं कीकई पार्टियों ने किया बिल का विरोध- 

कुछ पार्टियों का रुख न तो एनडीए के पक्ष में था और न ही इंडिया के पक्ष में, आखिर ये पार्टियां किस ओर जाएंगी इस पर सबकी नज़र थी.इनमें सबसे बड़ा नाम था बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी. जिन्होंने लोकसभा में ये बिल पेश होने के एक दिन पहले अपना रुख साफ़ किया और एनडीए को अपना समर्थन दिया.वहीं दूसरी ओर भारतीय राष्ट्र समिति और हनुमान बेनीवाल की पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, दोनों ने इस बिल का विरोध किया. इसका मुख्य कारण यह था कि दोनों पार्टियां आम आदमी पार्टी के साथ बेहतर रिश्ते रखती हैं.बहुजन समाज पार्टी इस विधेयक पर वोटिंग में शामिल ही नहीं हुई और शिरोमणि अकाली दल ने विधेयक को ‘तमाशा’ बताया

अब केवल सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद-

अब केजरीवाल सरकार के पास जो उम्मीद बची है, वो है सुप्रीम कोर्ट, जहाँ ये मामला विचाराधीन है.अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला भी आप के पक्ष में नहीं आता है तो ये पार्टी के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा कर देगा.इंडिया गठबंधन के नजरिए से देखें तो इससे विपक्ष का आत्मविश्वास बढ़ा है.विपक्ष में पार्टियों के बीच मजबूत एकता दिखी, ये आने वाले अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष की एकता रिहर्सल था. इस संशोधन पर चर्चा के दौरान विपक्ष की पार्टियां और क़रीब आई हैं.ख़ास कर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस जो एक दूसरे के आमने-सामने होती थी, उनमें विश्वास गहराया है. कई आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ये माना है कि कांग्रेस ने सदन में उन्हें पूरी मजबूती के साथ समर्थन दिया,मणिपुर को लेकर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर 8 से 10 अगस्त तक चर्चा होगी और संभव है कि विपक्ष इस चर्चा में और मजबूत नजर आएगा

2014 में जो मोदी के साथ हुआ, अब वही राहुल गांधी के साथ भी हो रहा है !

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देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ‘मोदी सरनेम’ मामले में राहत देते हुए उनकी सजा पर रोक लगा दी थी, अब लोकसभा सचिवालय की ओर से राहुल गांधी की सदस्यता बहाल होने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने ट्विटर अकाउंट से ‘अयोग्य सांसद’ से ‘संसद के सदस्य’ के रूप में अपडेट कर दिया है.  सदस्यता  बहाल होने के बाद राहुल गांधी संसद पहुंचे. संसद पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले गांधी प्रतिमा को नमन किया. लेकिन सदन में राहुल की एंट्री के साथ ही भाजपा ने फिर से उनको निशाने पर लेना शुरू कर दिया है, संसद में राहुल गांधी की वापसी पर बीजेपी नेता सुशील मोदी ने बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि राहुल की वापसी से कांग्रेसी भले ही खुश हो रही हों लेकिन उनके सहयोगी दुखी हैं. शरद पवार, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार।

 

 
 
क्यों की गई थी राहुल गांधी की सदस्यता रद्द- 
 
इसी साल 23 मार्च को राहुल गांधी को साल 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक के कोलार में दिए गए भाषण को लेकर सूरत की अदालत ने दो साल की सज़ा सुनाई थी. उस आदेश के ठीक अगले ही दिन लोकसभा सचिवालय ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए राहुल गांधी की सदस्यता रद्द कर दी थी.’मोदी सरनेम’ को लेकर मानहानि का दावा कोई पहला मामला नहीं है जब राहुल गांधी को लेकर भारतीय जनता पार्टी इतनी हमलावर हुई हो. इस पर सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता राकेश सिन्हा ने कहा था कि राहुल गांधी पश्चिमी देशों की ताक़तों के साथ मिलकर भारत की एकता, संप्रभुता की अवहेलना कर रहे हैं. इसी साल जून में राहुल गांधी अमेरिका के दौरे पर थे और राजधानी वाशिंगटन डीसी में उन्होंने कहा था कि “भारत में लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ना हमारा काम है.”उस दौरान उन्होंने वहां बसे भारतीयों से भारत वापस आने का अनुरोध करते हुए लोकतंत्र के साथ भारतीय संविधान की रक्षा में खड़े होने का आह्वान भी किया था. इससे कुछ महीने पहले राहुल गांधी की ब्रिटेन यात्रा को लेकर भी भारत में बहुत बवाल हुआ था. बीजेपी ने तब राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने विदेशी धरती पर भारतीय लोकतंत्र का अपमान किया है. हालांकि राहुल और पार्टी दोनों ने उस आरोप का खंडन किया था।

कई नेताओं के राहुल गांधी पर आरोप-

बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नक़वी ने तब कहा था, “राहुल गांधी विदेश में जा कर ये कहते हैं कि देश में प्रजातंत्र नहीं है.  नकवी ने कहा कि अगर देश में प्रजातंत्र न होता तो यहां का कोई नेता विदेश में जाकर भारत को, भारत के लोकतंत्र को, भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेता को, इस तरह के अपशब्द और दुष्प्रचार की भाषा बोल सकता था क्या ? “उस दौरे के बाद जून में ही स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे को लेकर राहुल गांधी पर बड़ा आरोप लगाया. उन्होंने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की. उस दौरान उन्होंने एक तस्वीर दिखाई और बोलीं, “राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे की इस तस्वीर में जो महिला सुनीता विश्वनाथन साथ बैठी हैं उनके जॉर्ज सोरोस के साथ संबंध हैं. यह पहले भी सामने आ चुका है कि जॉर्ज सोरोस भारत के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं.” स्मृति ईरानी ने यह भी दावा किया कि जॉर्ज सोरोस के संस्थान से जुड़े एक व्यक्ति का राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से संबंध भी था. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि “राहुल गांधी उनसे क्या बात कर रहे थे उन्हें इसकी जानकारी देश को देनी चाहिए.”अब जब सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की दो साल की सजा पर रोक लगा दी है तो बीजेपी की ओर से तो कोई प्रतिक्रिया नहीं आई लेकिन निरहुआ के नाम से प्रसिद्ध आजमगढ़ से बीजेपी के सांसद दिनेश लाल यादव ने कहा कि राहुल गांधी को संसद में आ कर माफी मांगनी चाहिए।

क्या कहते हैं वरिष्ट पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक- 

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक बताते  हैं,कि  “जिस तरह से राहुल गांधी की सदस्यता गई उससे जमीनी स्तर पर लोगों को अच्छा नहीं लगा. विपक्ष के नेताओं पर ईडी का उपयोग किया गया उससे आम  लोग उतने परेशान नहीं थे लेकिन राहुल गांधी के मामले में ये कहा जा रहा था कि देखो उन्हें संसद तक से निकाल दिया गया. “ये कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बीजेपी ने ही राहुल गांधी को देश का हीरो बना दिया है. पहले उनको पप्पू-पप्पू कह कर नीचा दिखाते थे. कहते थे कि अगर राहुल गांधी कांग्रेस प्रचारक हैं तो यह हमारे लिए बहुत आशादायक है. कांग्रेस का नेतृत्व राहुल करेंगे तो फिर जीवन भर बीजेपी जीतती रहेगी. राहुल गांधी को हीन भाव से टैग किया करते थे.”लेकिन राहुल गांधी ने इन सभी चीज़ों का जवाब अपनी भारत जोड़ो यात्रा से दे दिया. उन्होंने बता दिया कि वो गंभीर राजनीति करना चाहते हैं,  और कर भी रहे हैं. उनमें मेहनत करने की ताकत है और देश के लोग उनसे प्यार करते हैं.””ठीक ऐसा ही 2014 के चुनाव के दौरान हुआ था, उस समय कांग्रेस के कई नेताओं ने मोदी को लेकर ऐसे बयान दिए थे जिससे मोदी को ही फायदा पहुंचा,,आज वही बीजेपी राहुल के साथ दोहरा रही है,,राजनीतिक जानकार  कहते हैं, कि “राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के तुरंत बाद लोकसभा में हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर सरकार को जिस आक्रामकता से घेरा उससे एक बात तो समझ में आ गई कि आने वाले समय में बीजेपी के आगे एक सबसे बड़ी चुनौती राहुल गांधी के रूप में होगी.””मोदी शब्द को लेकर राहुल गांधी के कोलार में दिए गए वक्तव्य पर चार साल बाद सज़ा दी गई. उन्हें अधिकतम दो वर्ष की सज़ा दी गई थी. इससे उनकी संसद की सदस्यता चली गई. इस घटना ने उनके राजनीतिक भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था. इस मामले में सर्वोच्च न्यायलय ने जो टिप्पणी की वो राज्य स्तर की जूडिशियरी पर गंभीर चीज़ों को रेखांकित करती है।

 

क्या कहा वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने- 

लोकसभा में वापसी पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, कि “लोकसभा की सदस्यता वापस होने की स्थिति में राहुल गांधी फिर केंद्रीय भूमिका में होंगे. लेकिन इससे विपक्ष के नए गठबंधन ‘इंडिया’ में कुछ उथल-पुथल हो सकती है. हां वो विपक्ष के केंद्र बिंदु ज़रूर होंगे क्योंकि सवाल उन पर होंगे और उनसे ही पूछे जाएंगे. बीजेपी उनको फिर खारिज करेगी, उन पर हमला करेगी. तो कांग्रेस उनका सामने आकर राहुल का समर्थन करेगी.  ऐसी स्थिति में वो केंद्र बिंदु तो बनेंगे ही बनेंगे।

 


 प्रधानमंत्री विपक्ष के नए गठबंधन को लेकर चिंतित-

अब अगर अविश्वास प्रस्ताव से पहले राहुल गांधी संसद में वापस आए हैं तो उसी आक्रामकता के साथ वो अपनी बातें रखेंगे क्योंकि वो मणिपुर हो कर आए हैं. वहां की स्थिति को देख कर आए हैं.””ऐसी स्थिति में 2024 के चुनाव को जीतकर सत्ता में वापसी करने की राह में राहुल गांधी बीजेपी की राह का सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकते हैं “”बीजेपी लगातार राहुल गांधी को डिसक्रेडिट करने का प्रयास करती रही है. वो जितना राहुल गांधी को डिसक्रेडिट करने की कोशिश करती है, उनकी स्वीकार्यता उतनी ही बढ़ रही है. ठीक 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी के साथ हुआ था… बीजेपी की स्वीकार्यता पर सवाल उठ रहे हैं. माना ये भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री विपक्ष के नए गठबंधन को लेकर चिंतित हैं जब भी एनडीए की बात करते हैं तो विपक्ष के नए गठबंधन ‘इंडिया’ पर भड़कते जरुर हैं.” जिस इंडिया शब्द को लेकर कभी वो गर्व से कहते आए है की वोट फॉर इंडिया, वोट फॉर इंडिया अब उसी इंडिया को लेकर प्रधानमंत्री अपने बयानों में तुलना करते दिखाई देते हैं।

 

 


क्या कहा अशोक वानखेड़े ने- 
वरिष्ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े ज़ोर देकर कहते हैं, “राहुल गांधी कभी ‘पप्पू’ नहीं थे. ये बनाए गए थे. इसमें जहां बीजेपी का हाथ था वहीं कांग्रेस के नेताओं का भी हाथ था. कांग्रेसियों का ज़्यादा था.””अशोक वानखेड़े मानते हैं आज जब हिंडनबर्ग और मणिपुर जैसे मुद्दे सामने हैं तो ये भी पूछा जा रहा है कि क्या नोटबंदी, जीएसटी, चीन, कोविड, महंगाई, किसानों पर लाए गए तीन बिल, मणिपुर पर उठाए गए सवाल क्या ग़लत थे. ये सभी सवाल बाद में विकराल रूप लेकर सामने आये हैं .”वरिष्ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े ये भी बताते हैं कि “राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद को ठुकराया है. इसके बाद भी उन पर परिवारवाद का टैग लगता है, क्योंकि बीजेपी के तरकश में अब कोई तीर बचा नहीं. वर्तमान में जब आपके पास बताने के लिए कुछ बचा ही नहीं तो भविष्य की जीत के लिए  उसी पुराने परिवारवाद, नेहरू की बात कर के इतिहास के पीछे छुपते हैं. यही बीजेपी करती आ रही है।

 

क्या कहा नीरजा चौधरी ने- 

देश में इस साल कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. उसमें कांग्रेस और बीजेपी की स्थिति फिलहाल कैसी दिखती है.सीनियर पत्रकार और राजनीतिक जानकर नीरजा चौधरी कहती हैं,अगर ये दिखा कि राहुल गांधी जैसे ही कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका में आएंगे नए गठबंधन ‘इंडिया’ की कमजोरी या कहें डर सामने आ जाएगा. पटना में जो मीटिंग हुई थी उसमें मेरी जानकारी में आया कि राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने यह स्पष्ट कर दिया कि वो पूरी तरह सहयोग करेंगे. उसमें उन्होंने यह बता दिया कि ऐसा नहीं है कि मैं प्रधानमंत्री के पद का दावेदार होना चाहता हूं, ये चीज़ें नतीजे आने पर तय होती रहेंगी. उस दौरान उन्होंने अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को ही आगे रखा है. यह राहुल गांधी की तरफ से एक रोचक पहल रही है.”नीरजा चौधरी कहती हैं, “राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ज़रूर उत्साहित कर दिया है. लेकिन हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस को मिली जीत को राहुल गांधी से नहीं जोड़ सकते. वहां मिली जीत वहां के स्थानीय नेतृत्व की वजह से हुई।

क्या कहा अशोक वानखेड़े ने- 

इस पर अशोक वानखेड़े कहते हैं, कि”कांग्रेस इन विधानसभा चुनावों में ऊंचे मनोबल के साथ जा रही है. जब केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व मजबूत होगी तो निचले स्तर पर एकजुटता भी बढ़ेगी, जिसका अच्छा उदाहरण हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के चुनाव में देखने को मिला. आने वाले समय में ये देखेंगे कि तेलंगाना में कांग्रेस की सीटें क्या बढेगी ? वहीं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी बैकफ़ुट पर दिखती है.”वानखेड़े बताते हैं  कि बीजेपी का संगठन कमज़ोर पड़ रहा है. उन्होंने कहा, “हर जगह ब्रांड मोदी मात खाते हुए दिखाई देता है. पन्ना प्रमुख तब काम करेंगे जब कार्यकर्ता साथ होगा. कार्यकर्ता हतोत्साहित हो रहा है. उनको लग रहा है कि उनके नेताओं की बेइज्जती हो रही है. केंद्र के कुछ लोग ही प्रदेश की सभी चीज़ें तय कर रहे हैं. इससे  बीजेपी को बहुत अधिक नुकसान होता दिख रहा है. तो वर्तमान परिस्थिति में बीजेपी आगामी चुनावों को जीतती हुई दिखाई दे नहीं रही है।
नीरजा चौधरी कहती हैं, “राज्यों में कांग्रेस की जीत वहां के स्थानीय नेतृत्व की वजह से मिलेगी. राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच एक समझौता करवा दिया है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ हैं, वहां स्थानीय नेतृत्व मजबूत है. वहां इतने सालों की एंटी इनकम्बेंसी है.”अशोक वानखेड़े कहते हैं, “विधानसभा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा गया तो इसके जो भी नतीजे आएंगे उसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा. याद करें कि कर्नाटक में उन्होंने कहा था कि नब्बे गालियां मुझे दी जा रही हैं, जिसका बदला आपको लेना है. तो हार होने की स्थिति में यह उनकी हार है जिसका असर 2024 के चुनाव पर ज़रूर पड़ेगा।

क्या मोदी ही होंगे PM या कोई और करेगा NDA का नेतृत्व- 
नीरजा चौधरी भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं कि अगर 2024 के चुनाव से पहले ‘इंडिया’ गठबंधन ने अपनी एकता दिखाई और सोच समझ कर उम्मीदवार उतारे तो उसका असर पड़ेगा.लेकिन साथ ही वो ये भी कहती हैं कि, “विपक्षी गठबंधन ने बहुत अच्छा प्रदर्शन भी किया तो बीजेपी की 60-70 सीटें कम हो जाएंगी..  हो सकता है उन्हें गठबंधन की सरकार बनानी पड़े लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी ही रहेगी. उन्होंने एनडीए में 38 दलों को इकट्ठा कर लिया है. हालांकि ऐसी स्थिति में सरकार तो बीजेपी बनाएगी लेकिन नेतृत्व पर सवाल उठ सकता है कि क्या मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे या कोई और NDA का नेतृत्व करेगा।
 
 
 
 

संसद की कार्यवाही पर प्रति घंटे खर्च होते हैं करोड़ों रुपये, केवल 80 दिन ही होता है काम…

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क्या आपको ये पता है कि संसद में एक दिन सत्र को कराने में कितनी मोटी रकम खर्च होती है? हमारे और आपके द्वारा चुने गए नेताओं के संसद में शोर और हल्ला करने से देश की इकोनॉमी पर काफी असर पड़ रहा है,आप जान कर हैरान होंगे कि देश में रहने वाले टैक्सपेयर्स के  पैसों का नुकसान हर घंटे केवल संसद में नेताओं के हो-हल्ले के कारण हो रहा है।आप भी जानकर हैरान हो जाएंगे जब आपको संसद पर खर्च होने वाली रकम के बारे में पता चलेगा ? संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च आता है.



क्या है मांनसून सत्र-

देश की संसद में 20 जुलाई से मानसून सत्र जारी है, जो 11 अगस्त, 2023 तक चलेगा।  मणिपुर मामले को लेकर दोनों ही सदनों में खूब हंगामा हो रहा है। इसी को देखते हुए पिछले कुछ समय से संसद में कामकाज को लेकर सवाल उठते रहे हैं। संसद में होने वाले हंगामे और बहिष्कार के बीच जो समय खराब होता है, इसको लेकर भी सवाल खड़े किए जाते है। सबसे पहले बताते हैं की क्या है संसद के मानसून सत्र का शेड्यूल? देश का मानसून सत्र  20 जुलाई, 2023 से शुरू हुआ और 11 अगस्त को यह खत्म होगा।इस दौरान संसद में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण किसी भी मुद्दे पर ठीक से चर्चा नहीं हो पाई है।अब तक दोनों ही सदन लोकसभा और राज्यसभा हंगामेदार रहा।सुबह 11 बजे से संसद की कार्यवाही शुरू होती है, जो शाम 6 बजे तक चलती है। इस बीच सांसदों को लंच ब्रेक भी मिलता है, जो दोपहर 1 से 2 के बीच होता है।शानिवार और रविवार को छोड़ 5 दिन संसद की कार्यवाही जारी रहती है।अगर सत्र के दौरान कोई त्योहार पड़ जाए तो संसद का अवकाश माना जाता है। आपको ये भी बताते चलें कि संसद के तीन सत्र  होते हैं? पहला बजट सत्र जो फरवरी से लेकर मई,जबकि दूसरा मानसून सत्र जो चल रहा है ये जुलाई से अगस्त-सितंबर जबकि तीसरा सत्र शीत सत्र जो नवंबर से दिसंबर के बीच चलता है।

 
 
संसद की कार्यवाही पर इतना खर्च आता है- 

अब आपको बताते हैं कि संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च आता है। संसद की प्रत्येक कार्यवाही पर करीब हर मिनट में ढाई लाख (2.5 लाख) रुपये खर्च का अनुमान है। आसान भाषा में समझें तो एक घंटे में डेढ़ करोड़ रुपये (1.5 करोड़) खर्च हो जाता है।संसद सत्र के 7 घंटों में एक घंटा लंच को हटाकर बचते है 6 घंटे।इन 6 घंटों में दोनों सदनों में केवल विरोध, हल्ला और शोर होता है, जिसके कारण हर मिनट में ढाई लाख रुपये बर्बाद हो रहे हैं।संसद में हंगामा होने के कारण आम आदमी का ढाई लाख रुपए हर मिनट बर्बाद होता है।

 

सांसदों को मिलने वाला वेतन- 

अब आपको बताते हैं कि ये पैसा कैसे खर्च होता है ? ये पैसा सांसदों के वेतन,संसद सचिवालय पर आने वाले खर्च,संसद सचिवालय के कर्मचारियों के वेतन।सत्र के दौरान सांसदों की सुविधाओं पर होने वाले खर्च के रूप में ये पैसे खर्च होते है।दरअसल संसद की कार्यवाही के लिए जो पैसे खर्च किए जाते हैं वो हमारी और आपकी कमाई का हिस्सा होता है।ये वहीं रकम होती है, जिसे हम टैक्स के रूप में भरते हैं। लोकसभा की आंकड़ों के मुताबिक, सांसदों को हर महीने 50,000 रुपये सैलरी दी जाती है। वहीं, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता के रूप में सांसदों को 45,000 रुपये वेतन दिया जाता है।इसके अलावा सांसदों का कार्यालय खर्च भी होता है, जो 15,000 रुपये होता है।साथ ही सचिवीय सहायता के रूप में सांसदों को 30,000 रुपये दिए जाते हैं।इसका मतलब है कि सांसदों को प्रति माह 1.4 लाख रुपये सैलरी दी जाती है।सांसदों को सालभर में 34 हवाई यात्राओं का लाभ मिला हुआ है।सांसद ट्रेन और सड़क यात्रा के लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल कर सकते है।

इस पर क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट-

लोकसभा के पूर्व सचिव एस के शर्मा से जब संसद में प्रतिदिन कुल खर्च को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने संसद की तुलना सफेद हाथी से की। उन्होंने कहा कि संसद सफेद हाथी है, जिसको पालना यानी कि चलाना एक अलग ही टास्‍क है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि संसद में पूछे जाने वाले एक सवाल के लिए लाखों टन पेपर प्रिंट होते हैं, जिन्‍हें अलग-अलग मंत्रालयों में भेजा जाता है। जिसके लिए प्रिंट करने के लिए कागज, स्‍याही, लोग, गाड़ी, पेट्रोल-डीजल से जैसे तमाम खर्चे होते हैं। आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि संसद की एक दिन की कार्यवाही में कितना पैसा खर्च होता है। आशा है अब अच्छी तरह समझ गए होंगे कि इस देश की संसद पर हर एक घण्टे में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं और इसके बावजूद  संसद चल नहीं रही और इस देश की जनता का पैसा किस तरह इस देश के राजनेता उड़ा रहे हैं।